हफ़्ते में सिर्फ़ दो दिन अपना स्मार्टफ़ोन बंद रखना एक आसान फ़ैसला लगता है, लेकिन असल में यह इतना आसान नहीं है। टेक्नोलॉजी में दिलचस्पी रखने वाले एक व्यक्ति के अनुभव ने डिजिटल दुनिया पर बढ़ती निर्भरता को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
एक भारतीय यूज़र ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर अपना यह अनुभव साझा किया है। उनके मुताबिक़, वह हर शुक्रवार रात को अपना आई फ़ोन बंद कर देता था और रविवार तक एक सिंपल कीपैड फ़ोन इस्तेमाल करता था। मज़ेदार बात यह है कि सिद्धार्थ भिमानी नाम के इस शख्स का अपना एक यू ट्यूब चैनल है और इसमें उनके करीब पांच सौ वीडियो के साथ 18 हज़ार से अधिक सब्सक्राइबर भी हैं।
सिद्धार्थ के मुताबिक, इस अनुभव से एक तरफ मन की शांति, परिवार से जुड़ाव और फोकस बढ़ा, वहीं दूसरी तरफ यह भी सामने आया कि स्मार्टफोन आज की ज़िंदगी में सिर्फ़ एक सुविधा नहीं बल्कि रोज़ाना के कामों का एक ज़रूरी हिस्सा बन गए हैं।
इस यूज़र ने लिखा कि शुरू में यह बदलाव अजीब लगा, लेकिन जल्द ही इसका मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर अच्छा असर पड़ने लगा। सोशल मीडिया, नोटिफ़िकेशन और अलग-अलग ऐप्स से दूर रहने की वजह से मुझे काफ़ी एक्स्ट्रा टाइम मिला।
यूज़र के मुताबिक, इस दौरान मैंने किताबें पढ़ना शुरू किया, अपनी बेटी के साथ ज़्यादा समय बिताया और अपने परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताया। उन्होंने कहा कि खाने के समय, घर की बातों और रोज़ाना के छोटे-मोटे पलों में होने वाली रुकावटें कम हो गईं, जिससे मन की शांति और फोकस बढ़ा। आगे उन्होंने बताया कि इस अनुभव से चिंता कम हुई और मन पहले से ज़्यादा शांत महसूस हुआ।
हालांकि, इस अनुभव ने स्मार्टफोन पर हमारी प्रैक्टिकल निर्भरता को भी दिखाया। कुछ दिनों के बाद, उन्हें एहसास हुआ कि कॉन्टैक्ट लिस्ट को सिंपल फोन में ट्रांसफर करना आसान नहीं था और कुछ नंबर सही तरीके से ट्रांसफर नहीं हो पा रहे थे, जिससे बातचीत में मुश्किलें आ रही थीं।
इसके अलावा, मैप्स, ऑनलाइन फूड डिलीवरी और डिजिटल पेमेंट जैसे ज़रूरी ऐप्स का न होना भी एक बड़ी समस्या बन गई। कुछ मौकों पर, उन्हें ट्रैवल और रोज़ाना के दूसरे कामों के लिए अपनी पत्नी का फोन इस्तेमाल करना पड़ा। उन्होंने माना कि एक टेक-सैवी इंसान के लिए, होटल बिल भरते समय बैंक कार्ड, स्पेशल ऑफर और मोबाइल ऐप्स का एक्सेस न होना एक बहुत मुश्किल अनुभव था।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डिजिटल डिटॉक्स मेंटल हेल्थ के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन आज की डिजिटल इकॉनमी और रोज़ाना की ज़रूरतों की वजह से स्मार्टफोन से पूरी तरह दूरी बनाना भी एक प्रैक्टिकल चुनौती बन गया है।