दुनियाभर में इस समय डायबिटीज के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। मगर अब इससे जुड़ी जो चिंता सामने आई है उसने नै समस्या और सवाल खड़े कर दिए हैं। बाक़ी दुनिया की तरह भारत में भी लाखों लोग डायबिटीज के मरीज़ हैं। इस मर्ज़ की पहचान और निगरानी के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला HbA1c टेस्ट सही नतीजे नहीं दे पा रहा है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Lancet Regional Health- Southeast Asia ने यह तथ्य सामने रखा है।

लेंसेट की प्रकाशित इस नई रिसर्च के मुताबिक, भारत जैसे देशों में जहां एनीमिया और खून से जुड़ी बीमारियां आम हैं, वहां HbA1c पर पूरी तरह भरोसा करना भ्रामक हो सकता है।
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि फोर्टिस सी-डॉक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर डायबिटीज के चेयरमैन प्रोफेसर अनूप मिश्रा इस स्टडी का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके मुताबिक़ HbA1c पूरी तरह हीमोग्लोबिन पर निर्भर करता है। ऐसे में अगर हीमोग्लोबिन की मात्रा, संरचना या उसकी उम्र प्रभावित हो, तो ब्लड शुगर का सही अंदाजा नहीं लग पाता।
प्रोफेसर अनूप मिश्रा ने चेतावनी दी कि सिर्फ HbA1c पर निर्भर रहने से कुछ मरीजों में डायबिटीज की पहचान देर से हो सकती है, जबकि कुछ लोगों में गलत डायग्नोसिस भी हो सकता है।
HbA1c टेस्ट की मदद से दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर को मापा जाता है। आमतौर पर 5.7 प्रतिशत से कम स्तर को नॉर्मल, 5.7 प्रतिशत से 6.4 प्रतिशत को प्रीडायबिटीज और 6.5 प्रतिशत या उससे ज्यादा को डायबिटीज माना जाता है। वहीँ रिसर्च से पता चलता है कि जिन लोगों में एनीमिया, हीमोग्लोबिन से जुड़ी जेनेटिक गड़बड़ियां या G6PD एंजाइम की कमी होती है, उनको इस टेस्ट से गलत नतीजे मिल सकते हैं।
इस विषय में विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत जैसे देशों में डायबिटीज की जांच के लिए HbA1c को अकेले नहीं, बल्कि अन्य टेस्ट्स के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना चाहिए। इनमें ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट, ब्लड ग्लूकोज की नियमित मॉनिटरिंग, और बेसिक खून की जांच शामिल हैं।
वहीँ गंभीर मामलों में CGM और फ्रक्टोसामीन जैसे विकल्प भी उपयोगी हो सकते हैं। इस स्टडी में इस बात पर जोर दिया गया है कि एनीमिया-प्रभावित आबादी में HbA1c ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ नहीं रह जाता और डायबिटीज की सही पहचान के लिए परिस्थितियों के अनुसार जांच की तरीका अपनाना जरूरी है।
