विश्वसनीय मीडिया भ्रामक सूचनाओं का मुक़ाबला करने के साथ सरकारों की जवाबदेही बढ़ाता है- यूएन रिपोर्ट

152 देशों में किए गए शोध से पता चलता है कि जहाँ प्रैस को अधिक स्वतंत्रता है, वहाँ हिंसक टकराव, दमन और मानवाधिकार उल्लंघनों का जोखिम कम होता है।

आपदाओं के दौरान स्वतंत्र पत्रकारिता लोगों की जान बचाने और राहत सहायता जुटाने में अहम भूमिका निभाती है। यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट में सामने आई है।

संयुक्त राष्ट्र की साँस्कृतिक एजेंसी यूनेस्को की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 और मानवाधिकारों से लेकर जलवायु कार्रवाई व भूकम्प राहत तक, पत्रकारिता लोगों की जान बचाने और हानिकारक फ़र्ज़ी ख़बरों का मुक़ाबला करने में अहम भूमिका निभाती है। रिपोर्ट का शीर्षक है – ‘पत्रकारिता का मूल्य: अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और संकटों में मीडिया क्यों अहम है- वैश्विक प्रमाण।’

152 देशों में किए गए शोध से पता चलता है कि जहाँ प्रैस को अधिक स्वतंत्रता है, वहाँ हिंसक टकराव, दमन और मानवाधिकार उल्लंघनों का जोखिम कम होता है। रिपोर्ट में न्यूयॉर्क टाइम्स में आपदा पर प्रकाशित एक लेख के बाद अतिरिक्त 5 लाख डॉलर की आधिकारिक सहायता मिलने की बात कही गई है। साथ ही स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रमुख निष्कर्ष पर कहा जा सकता है-
स्वतंत्र प्रैस लोगों की जान बचाने, मानवीय आपदाओं के असर को कम करने और आपदा से निपटने की तैयारी को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाती है।
विश्वसनीय पत्रकारिता झूठी और हानिकारक भ्रामक सूचनाओं का मुक़ाबला करने का एक अहम ज़रिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, विश्वसनीय मीडिया भ्रामक सूचनाओं का मुक़ाबला करने के साथ-साथ सरकारों की जवाबदेही बढ़ाता है, प्रभावित समुदायों तक सहायता पहुँचाने में मदद करता है और अधिकारियों को कार्रवाई के लिए प्रेरित करता है। साथ ही अच्छी पत्रकारिता आपात ज़रूरतों एवं आपदाओं से निपटने के प्रयासों को अधिक प्रभावी और व्यापक बनाने में भी मदद करती है।

यूनेस्को के अनुसार, आलोचनात्मक पत्रकारिता मानवीय सहायता क्षेत्र की निगरानी में भी अहम भूमिका निभाती है, जिससे कमियों को उजागर करने, सुधार लाने और राहत प्रयासों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।

झूठी ख़बरों से मुक़ाबला
झूठे दावे, अफ़वाहें और भ्रामक सूचनाएँ संकटों को और गम्भीर बना सकती हैं। इससे समुदायों की आपदाओं के लिए तैयारी करने, उनसे निपटने और बाद में पुनर्बहाली की क्षमता कमज़ोर होती है। इनके कारण ज़रूरतमन्द लोगों तक सहायता पहुँचने में भी बाधा आ सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, ग़लत रिपोर्टिंग हिंसक टकराव को बढ़ावा दे सकती है और राहतकर्मियों के ख़िलाफ़ हिंसा का कारण भी बन सकती है। कोविड-19 जैसे स्वास्थ्य संकटों के दौरान भ्रामक सूचनाओं से भारी नुक़सान हुआ। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे “सूचना महामारी”(infodemic) का नाम दिया। वहीं, विश्वसनीय पत्रकारिता झूठे दावों का मुक़ाबला करने और विशेषज्ञों की सलाह लोगों तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाती है।

राहत सहायता पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, समाचारों से लोगों को बड़े पैमाने पर दान देने की प्रेरणा भी मिल सकती है। ब्रिटिश पत्रकार माइकल बर्क की 1984 में इथियोपिया के अकाल पर बीबीसी के लिए की गई रिपोर्टिंग का इतना असर हुआ कि राहत प्रयासों के लिए 20 करोड़ डॉलर से अधिक की धनराशि जुटी।

2015 में तुर्की की फ़ोटो पत्रकार नीलूफ़र देमिर ने डूबकर मारे गए बच्चे एलन कुर्दी की तस्वीर खींची। इस तस्वीर ने सीरिया में जारी युद्ध की ओर दुनिया का ध्यान खींचा। इसके बाद दान में तेज़ बढ़ोत्तरी हुई और कुछ ग़ैर-सरकारी संगठनों को मिलने वाली वित्तीय सहायता 50 गुना तक बढ़ गई।

पत्रकारिता राहत सहायता क्षेत्र के भीतर बड़े सुधारों का रास्ता भी खोल सकती है। #AidToo मामले में पत्रकारों ने हैती में सत्ता के दुरुपयोग और दण्डमुक्ति की संस्कृति को उजागर किया, जिसमें Oxfam और Save the Children जैसे ग़ैर-सरकारी संगठन शामिल थे।

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