भारत ने जिनीवा स्थित पैलेस ऑफ़ नेशंस को भेंट किए पाँच मोर

भारत से भेजे गए इन मोरों का नया ठिकाना संयुक्त राष्ट्र के योरोपीय मुख्यालय परिसर में हरे-भरे एरियाना पार्क की एक विशाल पक्षीशाला है। इनमें चार नीले मोर के बीच पाँचवाँ एक दुर्लभ सफ़ेद मोर है। जो अपने रंग-बिरंगे साथियों की टोली में अलग ही नज़र आता है।

भारत से भेजे गए पाँच युवा मोरों स्वागत संयुक्त राष्ट्र के जिनीवा स्थित पैलेस ऑफ़ नेशन्स में किया गया। भारत की ओर से बतौर उपहार दिए गए ये मोर अपने चटख रंगों और शाही अन्दाज़ के साथ सभी का आकर्षण का केंद्र बने हैं। दरअसल ये मोर संयुक्त राष्ट्र परिसर में दशकों से चली आ रही एक अनोखी परम्परा की नई कड़ी हैं। मोरों की मौजूदगी का यह इतिहास इतना पुराना है कि इसकी जड़ें संयुक्त राष्ट्र ही नहीं, बल्कि उसके पूर्ववर्ती संगठन लीग ऑफ़ नेशन्स की स्थापना से भी पहले तक जाती हैं।

इन मोरों का नया ठिकाना संयुक्त राष्ट्र के योरोपीय मुख्यालय परिसर में हरे-भरे एरियाना पार्क की एक विशाल पक्षीशाला है। इनमें चार नीले मोर के बीच पाँचवाँ एक दुर्लभ सफ़ेद मोर है। जो अपने रंग-बिरंगे साथियों की टोली में अलग ही नज़र आता है।

इन पाँचों के नामकरण पर संयुक्त राष्ट्र जिनीवा की महानिदेशक तातियाना वालोवाया ने बताया कि जल्द ही इनके नाम सुझाने के लिए एक प्रतियोगिता शुरू की जाएगी। उन्होंने कहा, ‘हमें पाँच नए मोरों, चार नीले और एक सफ़ेद का स्वागत करते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है। संयोग से इनके रंग भी संयुक्त राष्ट्र के नीले और सफ़ेद रंगों से मेल खाते हैं।’

इन नए मेहमानों में सबसे ज़्यादा आकर्षण का केन्द्र बना सफ़ेद पंखों वाला मोर। बड़ी संख्या में आगंतुक उसके साथ सेल्फ़ी लेने के लिए उत्सुक नज़र आए। अपने नीले और रंग-बिरंगे साथियों की तरह यह भी भारत के राष्ट्रीय पक्षी की प्रजाति से है।

यूएन रिपोर्ट के मुताबिक़, करीब पैंतालीस वर्ष पहले, भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने दिल्ली चिड़ियाघर से मोरों का एक जोड़ा अपने विमान से संयुक्त राष्ट्र जिनीवा भेजा था। जिनीवा स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत और स्थाई प्रतिनिधि अरिन्दम बागची ने कहा, ‘यहाँ मोर रखने की पुरानी परम्परा रही है। हमने 1981 में भी मोर का उपहार में मले थे और हमें ख़ुशी है कि यह परंपरा बरक़रार हैं।

जिनीवा बायोपार्क के निदेशक डॉक्टर टोबियास ब्लाहा ने उम्मीद जताई कि इन पक्षियों को अपना नया ठिकाना पसन्द आएगा। उनकी संस्था मोरों की देखभाल व निगरानी करेगी। रिपोर्ट के मुताबिक़, कुछ महीनों तक अपने नए माहौल में ढलने के बाद ये पाँचों मोर पक्षीशाला से बाहर निकलकर संयुक्त राष्ट्र जिनीवा परिसर में स्वतंत्र रूप से घूम सकेंगे।

बताते चलें कि इस सप्ताह की शुरुआत में पशु चिकित्सक डॉक्टर टोबियास ब्लाहा, पाँचों मोरों को एक विशेष रूप से तैयार की गई एम्बुलेंस में संयुक्त राष्ट्र जिनीवा लेकर आए थे। एम्बुलेंस में पुनर्जीवन उपकरण और अन्य चिकित्सा साधन भी मौजूद थे ताकि सफ़र के दौरान पक्षियों को तनाव होने पर ज़रूरत के मुताबिक उनका इस्तेमाल किया जा सके।

डॉक्टर टोबियास ब्लाहा ने कहा, ‘यह उनके लिए लगभग आदर्श ठिकाना है, क्योंकि उन्हें लम्बे समय तक पक्षीशाला में बन्द नहीं रहना पड़ेगा। यहाँ पुराने पेड़ हैं, भरपूर छाया है, तरह-तरह के फूल हैं और घास के खुले मैदान भी हैं।’

डॉक्टर ब्लाहा ने बताया कि युवा और अनुभवहीन मोर इतने बड़े और खुले पार्क में रहने के अभ्यस्त नहीं होते। इसलिए वे अक्सर रात बिताने के लिए ऐसी डालियाँ चुन लेते हैं, जो लोमड़ियों से बचने के लिए पर्याप्त ऊँची नहीं होतीं। आगे उन्होंने कहा, ‘इसलिए हमें उन पर नज़र रखनी होगी…वे जितनी ऊँचाई पर सोएँगे, उतने ही सुरक्षित रहेंगे, क्योंकि लोमड़ियाँ पेड़ों पर नहीं चढ़तीं।’

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस हरे भरे परिसर में लोमड़ी और मार्टेन जैसे शिकारी जीव मौजूद हैं, जिनसे मोरों को बचाना एक चुनौती होगी। बताते चलें कि इन पाँच नए मोरों के आने से पहले परिसर में केवल एक मोर बचा था, जो अकेला घूमता था और बहुत कम दिखाई देता था।

रिपोर्ट से यह भी पता चला कि संयुक्त राष्ट्र परिसर में मोर रखने की परम्परा बहुत पुरानी है। इसकी शुरुआत स्विस पुरातत्वविद और कला संग्रहकर्ता गुस्ताव रेविलियो के समय से मानी जाती है। साल 1890 में उन्होंने अपनी वह सम्पत्ति जिनीवा शहर को विरासत में सौंप दी थी, जहाँ आज संयुक्त राष्ट्र परिसर स्थित है।

वर्ष 1951 में एक स्थानीय समाचार पत्र ने उस समय परिसर में बचे एकमात्र मोर पर ख़बर प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था – ‘क्या अकेले मोर पियरे की जगह कोई और आएगा?’

रिपोर्ट में वर्ष 1954 का एक और दिलचस्प क़िस्सा दर्ज है। उस समय एक मोर, सोवियत प्रतिनिधिमंडल की कार पर जा चढ़ा, जिससे वहाँ मौजूद ऊबे हुए फोटोग्राफरों को तस्वीरें लेने का एक अच्छा मौक़ा मिल गया। पत्रकारों ने मज़ाकिया अन्दाज़ में उसे “the Geneva dove” का नाम दे दिया।

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