पुलिस और एग्जीक्यूटिव अथॉरिटी प्राइवेट प्रॉपर्टी से जुड़े झगड़ों का फ़ैसला नहीं कर सकतीं। यह कहना है इलाहाबाद हाई कोर्ट का। साथ ही अदालत ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को चेतावनी दी कि वे शांति बनाए रखने तक ही दखल दें, वरना कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी प्राइवेट अचल संपत्ति (जैसे ज़मीन या मकान) के मालिकाना हक या कब्ज़े से जुड़े सिविल झगड़ों का फ़ैसला नहीं कर सकते। वे केवल सार्वजनिक शांति बनाए रखने और कानून-व्यवस्था की समस्या को रोकने के लिए ही दखल दे सकते हैं।
इंडिया टूडे की एक खबर के मुताबिक़, कोर्ट ने एक याचिका का निपटारा करते हुए उत्तर प्रदेश में पुलिस और एग्जीक्यूटिव अथॉरिटी को ऐसे मामलों में मौजूदा सरकारी आदेशों और पुलिस सर्कुलर का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया।
जस्टिस शेखर बी सराफ़ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की लखनऊ बेंच ने लखनऊ के 85 वर्षीय इंद्र पति और एक अन्य याचिकाकर्ता की याचिका पर यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं ने अधिकारियों को एक विवादित संपत्ति पर उनके शांतिपूर्ण कब्ज़े में दखल देने और सक्षम कोर्ट के किसी आदेश के बिना उन्हें परेशान करने से रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की थी।
बेंच ने कहा कि यह मामला पारिवारिक संपत्ति के झगड़े से जुड़ा है और ध्यान दिलाया कि पार्टियों के बीच सिविल केस पहले से ही चल रहा है। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं ने यह नहीं बताया कि हाई कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल क्यों करना चाहिए, जबकि यह मूल रूप से एक प्राइवेट सिविल झगड़ा है।
कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों और प्राइवेट प्रतिवादियों के बीच मिलीभगत के आरोपों की विस्तृत जांच करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आरोपों पर उचित कानूनी तरीकों से अलग से कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें शिकायत करना या ज़रूरत पड़ने पर FIR दर्ज कराना शामिल है।
कानूनी स्थिति को दोहराते हुए, बेंच ने कहा कि पुलिस और एग्जीक्यूटिव अथॉरिटी के पास प्राइवेट पार्टियों के बीच अचल संपत्ति के मालिकाना हक, कब्ज़े या सीमा से जुड़े सिविल झगड़ों का फ़ैसला करने या उनमें दखल देने का अधिकार नहीं है। वे केवल सार्वजनिक शांति बनाए रखने और कानून-व्यवस्था बिगड़ने से रोकने के लिए ही सीमित हद तक दखल दे सकते हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस और रेवेन्यू अथॉरिटी सिविल अधिकारों का निर्धारण करने के लिए सक्षम न्यायिक मंच नहीं हैं और एक प्राइवेट पार्टी इनका इस्तेमाल दूसरी पार्टी को बेदखल करने या विवादित संपत्ति का कब्ज़ा हासिल करने के लिए नहीं कर सकती है।
कोर्ट ने राज्य भर के पुलिस अधिकारियों, ज़िला मजिस्ट्रेटों, सब-डिविज़नल मजिस्ट्रेटों और अन्य एग्ज़ीक्यूटिव अधिकारियों को इन निर्देशों का सख्ती से पालन करने का आदेश दिया और चेतावनी दी कि निर्देशों का पालन न करने पर विभागीय कार्रवाई और कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही हो सकती है। याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी गई कि वे सक्षम अधिकारी या सिविल कोर्ट के सामने उचित राहत के लिए अपील कर सकते हैं।