यूके सहित अन्य जगहों पर बिब्लियोथेरेपी को लोगों के मासिक स्टेटस को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है। इसके लिए नॉन-फिक्शन और सेल्फ-हेल्प साहित्य की सिफारिश की जाती है। बीबीसी की एक रिपोर्ट इस पर रौशनी डालती है।
लोगों की भलाई और मानसिक सेहत को बेहतर बनाने के तरीके के तौर पर “बिब्लियोथेरेपी” तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है। लेकिन इसका सही असर इस बात पर निर्भर करता है कि किताब कौन सी है और व्यक्ति कौन है।
कई लोगों का मानना है कि “क्रिएटिव बिब्लियोथेरेपी” में मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की क्षमता होती है। इस थेरेपी के तहत फिक्शन यानी काल्पनिक कहानियों की चुनिंदा किताबें सुझाने का तरीका अपनाया जाता है। इस थेरेपी के बाद, अकसर लोग काल्पनिक किरदारों की सीख और गलतियों से उन्हें अपनी स्थिति को समझने में मदद लेते हैं और उन्हें कम अकेलापन महसूस होता है।
गौरतलब है कि ज़िंदगी के मुश्किल फैसलों में मदद करने के साथ कुछ खास मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज के तौर पर भी यह तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है।
रिपोर्ट में फिक्शन-आधारित या “क्रिएटिव बिब्लियोथेरेपी” के समर्थक इसके फायदों के हवाले से तर्क देते हुए कहते हैं कि समृद्ध, काल्पनिक दुनियाओं में खो जाना, मुश्किल हालात से निपटने के तरीके खोजने या बस रोज़मर्रा की परेशानियों से कुछ पल के लिए राहत पाने में मदद कर सकता है।
इस बारे में रिपोर्ट बताती है कि दो रिसर्चर्स ने 2016 में ‘द लैंसेट’ में छपे एक पेपर में लिखा था, बेहतरीन साहित्य में डूबने से “परेशान मन को राहत मिल सकती है, वह ठीक हो सकता है और उसमें नई ऊर्जा आ सकती है। साथ ही यह तनाव, एंग्जायटी और मन की दूसरी परेशान स्थितियों को कम करने में भी मदद कर सकता है।
यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि इस बात का ध्यान रखना होगा कि हर तरह का फिक्शन हर किसी की मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने में सहायक नहीं होता। मसलन कोई भी व्यक्ति जिसने कभी नाटक, कविता या फिक्शन पढ़ा और पसंद किया है, वह कह सकता है कि कहानियों का हमारे मन और भावनाओं पर गहरा असर पड़ता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इससे मेंटल हेल्थ हर परिस्थिति में बेहतर ही बने।
इस आर्टिकल के लिए इंटरव्यू के दौरान कई एक्सपर्ट्स ने चिंता जताई कि खास मेंटल हेल्थ कंडीशन के इलाज में ‘क्रिएटिव बिब्लियोथेरेपी’ (साहित्य के ज़रिए इलाज) के बारे में बहुत ज़्यादा उम्मीदें जगाई जा रही हैं, जबकि उनका कहना है कि इसके लिए साइंटिफिक सबूत अभी भी बहुत कम हैं। असल में, रिसर्च से पता चलता है कि कुछ किताबें नुकसानदेह भी हो सकती हैं।
इसके बजाय, मौजूदा रिसर्च एक अलग और बारीक तस्वीर दिखाती है। लंदन इंटरडिसिप्लिनरी स्कूल के कंप्यूटेशनल कॉग्निटिव साइंटिस्ट जेम्स कार्नी कहते हैं कि फिक्शन आम तौर पर भलाई को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन यह बहुत हद तक व्यक्ति, किताब और वे उससे कैसे जुड़ते हैं, इस पर निर्भर करता है।
कार्नी आगे यह भी कहते हैं, “एक सोच यह है कि किताबें कोई जादुई चीज़ हैं जो सब कुछ ठीक कर देंगी। मुझे लगता है कि कुछ खास कंडीशन और खास तरह की पर्सनैलिटी के लिए ऐसा हो सकता है, लेकिन यह सोचना कि वे हर बीमारी की दवा हैं, बिल्कुल गलत है।”