39 साल बाद फ़ेसबुक ने एक बाप को उसकी अपनी ही बेटी से मिलवाया!

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क़रीब चालीस साल पहले बिछड़ा एक परिवार सोशल मीडिया की बदौलत दोबारा मिल पाया है.
फ़ारिया 39 साल की हैं और उनका जन्म सोवियत रूस के लेनिनग्राद में हुआ था. उनकी मां रूस की हैं और पिता सैय्यद अहमद शरीफ़ सोमालिया के हैं, जिनकी शादी 1976 में हुई थी.

 
शरीफ़ उन चुनिंदा लोगों में शामिल थे जिन्हें सोवियत संघ में पढ़ाई के लिए बुलाया गया था. उस वक़्त सोवियत संघ का मक़सद अफ़्रीकी देशों में अपना प्रभाव बढ़ाना था.
फ़ारिया के जन्म के एक साल बाद ही सोमालिया और इथियोपिया के बीच जंग छिड़ गई. इस जंग में सोवियत रूस ने इथियोपिया का साथ दिया था.

 

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इसीलिए सोमालिया ने अपने देश में मौजूद सोवियत संघ के सभी सलाहकारों को बाहर निकाल दिया और सोवियत संघ में मौजूद अपने सभी छात्रों को वापस बुला लिया जिसमें फ़ारिया के पिता भी थे.

 
फ़ारिया कहती हैं, “मैं और मेरी मां उस वक़्त पश्चिमी साइबेरिया में अपनी नानी के पास थे. मेरी मां को तुरंत ही एहसास हो गया था कि हमारे परिवार के लिए इस जंग का मतलब क्या है.”

 
शरीफ़ को 24 घंटे में ही रूस छोड़ना पड़ा. वो अपने परिवार को अलविदा तक नहीं कह पाए, लेकिन उन्होंने मोगादिशु में अपने मां-बाप के पते के साथ एक चिट्ठी रूस में अपने घर में ज़रूर छोड़ दी थी.

 
फ़ारिया जब बच्ची थीं तो हमेशा अपनीfarhiya_request_to_deeq_for_her_father_624x624__nocredit मां से पूछा करती थीं कि पिताजी कैसे दिखते हैं? इस पर उनकी मां कहती थीं, “आईना देख लो. तुम उन्हीं की तरह बात करती हो, उन्हीं की तरह चलती हो और उन्हीं की तरह तर्क भी करती हो.”
फ़ारिया के पास अपने पिता की कुछ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों के अलावा कुछ नहीं था. वो बताती हैं, “मुझे पता है वो केवल परिस्थितियों के कारण ही वो हमें छोड़कर गए थे.”

 

फ़ारिया बताती हैं, “अपने पिता को ढूंढने की इच्छा हमेशा मेरे मन में थी, लेकिन जब मैं 12 साल की हुई तब मैंने सोचा कि इसके लिए मुझे कुछ करना होगा.”

 
उस वक़्त रूस के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव थे. फ़ारिया ने अपने पिता को मोगादिशु के पते पर कई चिट्ठियाँ लिखीं, लेकिन वो हमेशा वापस लौट आती थीं. उन्होंने कई संस्थाओं से भी मदद हासिल करने की कोशिश की, लेकिन असफल रहीं.

 
फिर 1991 में सोमालिया में गृह युद्ध छिड़ा गया जो फ़ारिया के लिए बहुत बुरी ख़बर थी. यह युद्ध करीब दो दशकों तक चला. इसके ख़त्म होने के बाद ही वहाँ सोशल मीडिया में नया उभार आया, जिसने फ़ारिया को नई उम्मीद दी.

 

फ़ारिया सबसे पहले रूस की एक सोशल मीडिया साइट पर एक महिला के संपर्क में आईं जो बिछड़े परिवारों को मिलाने में मदद करती थीं. लेकिन फ़ारिया के पिता सोमालिया में थे, इसलिए वह महिला फ़ारिया की कोई मदद नहीं कर पाईं.
फिर फ़ारिया ने इंस्टाग्राम पर सोमालिया की तस्वीरों को ढूंढना शुरू किया. उन्हें वहाँ डीक़ नाम का एक व्यक्ति मिला जिसके संपर्क दूर तक फैले हुए थे. डीक़ के सोमालिया सरकार में भी काफ़ी अच्छे संपर्क थे. इसलिए फ़ारिया ने मदद के लिए उन्हें मैसेज किया.

 

इसी साल 16 मार्च को डीक़ ने फ़ारिया के आग्रह को अपने फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट किया. उसके बाद इस पोस्ट पर ढेर सारे क़मेंट आने लगे. इसी में नॉर्वे से किसी ने लिखा, “ये हमारी बहन फ़ारिया है.”

 
यह कॉमेंट ओस्लो में रह रहे फ़ारिया के सौतेले भाई का था. उस वक़्त उनके पिता भी उनके साथ ही मौजूद थे. फिर फ़ारिया को फेसबुक मैसेज बॉक्स में एक संदेश मिला, ”बधाई हो हमने आपके पिताजी को ढूंढ लिया है.”

 
वो कहती हैं, “जब मुझे यह ख़बर मिली तो मुझे इस पर यक़ीन नहीं हुआ. यह एक सपने के सच होने जैसा था.”

 

फिर अपने पिता से मिलने के लिए फ़ारिया अपने पति और मां के साथ नॉर्वे पहुंचीं. वो कहती हैं, “वो ठीक वैसे ही थे, जैसा मैंने सोचा था. हम बिल्कुल एक जैसे चलते हैं, हमारी आवाज़ भी एक जैसी ही है.”

 
फ़ारिया के मुताबिक, “जब हमने पहली बार स्काइप पर बात की थी तो पिताजी ने मुझे बताया कि हमसे संपर्क करने के लिए उन्होंने भी बहुत कोशिश की थी.”

 
वे लोग अब लगातार एक-दूसरे से बात करते हैं. फ़ारिया अब अपने पिता से दोबारा मिलने की योजना बना रही हैं. उन्हें बीते चार दशकों की अपनी और अपनी मां की ढेर सारी बातें अपने पिता से करनी हैं. उनके पिता ने चालीस साल पहले रूसी भाषा सीखी थी, जो खुशकिस्मती से उन्हें आज भी याद है.

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