खुशी और जीवन संतुष्टि पर किये गए एक अध्ययन से मिलने वाले नतीजे हैरान करते हैं। अध्ययन से पता चला है कि वर्तमान युग में युवा पीढ़ी सबसे ज़्यादा दुखी और असंतुष्ट पीढ़ी बन गई है।

लंबे समय से किये जाने वाले विभिन्न अध्ययनों से यह जानकारी सामने आई है कि लोग जीवन के मध्य भाग, यानी अधेड़ उम्र में सबसे ज़्यादा दुखी होते हैं। वहीँ दूसरी तरफ युवा और वृद्ध लोग अपेक्षाकृत ज़्यादा खुश और संतुष्ट दिखाई देते हैं, जिसे अक्सर खुशी का यू-बेंड (U-Bend of Happiness) या निराशा का कूबड़ (Hump of Despair) कहा जाता है।
अध्ययन के अनुसार, यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो जेनरेशन Z, जो अभी भी अपनी युवावस्था में गंभीर नाखुशी से जूझ रही है, उम्र बढ़ने के साथ और अधिक मानसिक तनाव और निराशा का सामना कर सकती है।
हालाँकि, हाल के वर्षों में यह चलन बदल गया है। PLOS ONE जर्नल में 27 अगस्त को प्रकाशित एक को देखें तो इस नए अध्ययन के अनुसार, युवा अब दुनिया भर में सबसे ज़्यादा दुखी महसूस कर रहे हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक एक ग्लोबल स्टडी कहती है कि दुनियाभर में 18 से 29 साल के युवा खुशियों के लिए तरस रहे हैं। इन युवाओं की मेंटल और फिजिकल हेल्थ भी चिंताजनक पाई गई। रिसर्च में यह बात भी सामने आई है कि आज के युवा अपनी पहचान, जीवन के उद्देश्य, रिश्तों की क्वालिटी और आर्थिक स्थिरता को लेकर भी संघर्ष कर रहे हैं। इन्हें हर मोर्चे पर स्ट्रगल करना पड़ रहा है, जो उनकी खुशियों पर ग्रहण बन गया है।
स्टडी में मिलने वाली जानकारी 20 देशों के 2 लाख से ज्यादा लोगों ने खुद दी थी। नेचर मेंटल हेल्थ जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में हार्वर्ड और बायलर यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट्स ने भी सहयोग किया।
अध्ययन में पाया गया कि अब युवाओं में एवरेज फ्लरिशिंग यानी जीवन में संतुलन और खुशी का स्तर 50 वर्ष की उम्र तक कम ही रहता है। स्टडी के लीड ऑथर टायलर जे वेंडरवीले का कहना है कि युवाओं को लेकर यह स्थिति काफी गंभीर है।
युवा पीढ़ी का भविष्य खतरे में है
इस बदलाव का वर्णन करते हुए, अर्थशास्त्री डॉ. एलेक्स ब्रायसन ने कहा कि यह अब मध्य-आयु में दुख का उभार नहीं है, बल्कि एक ढलान जैसा परिदृश्य है, जहाँ युवावस्था में ही दुख उच्च स्तर पर शुरू हो जाता है।
संयुक्त राज्य अमरीका में किए गए एक बड़े सर्वेक्षण में यह जानकारी हासिल हुई। इस अध्ययन को व्यवहार जोखिम कारक निगरानी प्रणाली (Behavioral Risk Factor Surveillance System) के आँकड़ों में किया गया था। शोध के नतीजे बताते हैं कि 2009 से 2018 तक के आँकड़ों के अनुसार, मध्यम आयु वर्ग के लोग सबसे ज़्यादा दुखी दिखाई दिए।
हालाँकि, 2019 और 2024 के बीच युवाओं में नाखुशी का स्तर काफ़ी बढ़ गया। वहीँ इन आंकड़ों में मध्यम आयु वर्ग और वृद्ध लोगों की स्थिति लगभग समान पाई गई। अध्ययन के नतीजों पर चिंता जताते हुए एक्सपर्ट कह रहे हैं कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो वर्तमान में अपनी युवावस्था में गंभीर नाखुशी का सामना कर रही जेनरेशन Z उम्र बढ़ने के साथ और अधिक मानसिक तनाव और निराशा का सामना कर सकती है।













