प्रत्येक वर्ष 19 जून को विश्व सिकल सेल दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मानाने का मकसद सिकल सेल बीमारी के बारे में लोगों को जागरूक करना है।

भारत ने सिकल सेल बीमारी का पता लगाने के लिए अब तक लगभग 5.72 करोड़ लोगों की जांच की है। ‘भारत सिकल सेल मुक्त भविष्य अभियान’ के तहत देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुरुवार को सिकल सेल दिवस के अवसर पर यह जानकारी दी।
हमारे खून की लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करने वाली सिकल सेल बीमारी दरअसल एक जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है। इस बीमारी में आरबीसी की संख्या कम हो जाती है, जिससे शरीर के अंगों तक सही मात्रा में ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित होती है।
इस समस्या से पीड़ित इंसान को थकान, दर्द और कमजोरी जैसी परेशानियां हो सकती हैं। वक्त पर अगर इस समस्या का इलाज न हो, तो यह बीमारी खतरनाक भी हो सकती है।
भारत में सिकल सेल बीमारी के मामले अधिक सामने आते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां आदिवासी रहते हैं। हालाँकि यह बीमारी गैर-आदिवासी लोगों को भी हो सकती है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी वास करती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक़, भारत की कुल आबादी का लगभग 8.6 प्रतिशत हिस्सा, यानी करीब 6.78 करोड़ लोग आदिवासी हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली जुलाई 2023 को इस बीमारी से निपटने के लिए मध्य प्रदेश से राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया। इस मिशन का उद्देश्य देश में सिकल सेल बीमारी को समाप्त करना है।
स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि ”3 जून 2025 तक, कुल 5.72 करोड़ लोगों की सिकल सेल बीमारी की जांच हो चुकी है। यह जांच उनके तीन साल के लक्ष्य का 75 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा पूरा कर चुकी है।”
अप्रैल 2024 से अप्रैल 2025 के मध्य, 2.65 करोड़ से ज्यादा लोगों की सिकल सेल बीमारी की जांच की गई। राज्यों ने अब तक 2.50 करोड़ सिकल सेल स्टेटस कार्ड जारी किए हैं। जिससे पता चलता है कि 1.98 लाख लोगों में सिकल सेल बीमारी पाई गई है और 14 लाख लोगों में सिकल सेल की सूक्ष्म स्थिति देखी गई है।














