सायकिल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक समावेशन, लैंगिक समानता और पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम भी है।
विश्व साइकिल दिवस की जाने का मक़सद यह था कि मानव जीवन में भविष्य की अनेक चुनौतियों का समाधान जटिल तकनीकों में नहीं, बल्कि सरल और टिकाऊ उपायों से भी संभव है। सायकिल एक सस्ती, विश्वसनीय, पर्यावरण-अनुकूल, बहुमुखी और टिकाऊ परिवहन प्रणाली है, जो सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
वर्ष 2026 के लिए विश्व साइकिल दिवस की थीम ‘एक हरित भविष्य के लिए साइकिल चलाना’ निर्धारित की गई है। यह थीम पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा बचत तथा टिकाऊ शहरी विकास में साइकिल की भूमिका को रेखांकित करती है।
‘विश्व साइकिल दिवस’ की घोषणा 3 जून 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में की गई। इस पहल के पीछे समाजशास्त्री और पूर्व अंतरराष्ट्रीय साइकिल चालक प्रोफेसर लेस्ज़ेक सिबिल्स्की के नेतृत्व में चलाया गया वैश्विक अभियान था। उनके इस मिशन को 56 देशों का समर्थन प्राप्त हुआ।
विश्व साइकिल दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य साइकिल के प्रति लोगों में जागरूकता, स्वास्थ्य, पर्यावरण तथा साइकिल को एक टिकाऊ साधन के रूप में इसकी पहचान कायम रखना है। छोटी मोटी दूरी का सफर तय करा देने वाली ऐसी सवारी जिसे डीज़ल या पेट्रोल की भी ज़रूरत नहीं होती। और इस तरह से यह अपने बजट के साथ भी दोस्ताना व्यहवार रखती है।
संयुक्त राष्ट्र ने अपने प्रस्ताव में माना कि सायकिल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक समावेशन, लैंगिक समानता और पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम भी है।
उन्नीस्वी सदी के प्रारम्भ में वर्ष 1817 के लगभग साइकिल का अविष्कार हुआ था। भारत में साइकिल का आगमन वर्ष 1890 से 1910 के दौरान हुआ और यह मुंबई पहुंची। शुरुआत में काफी समय तक इसका विदेश से आयत किया गया।
एक समय में इसे बेहद टेक्नीकल और हैरान करने वाला अविष्कार माना जाता था। साल 1942 के करीब से देश में ही साइकिल का निर्माण होने लगा, और धीरे-धीरे कई कंपनियां साइकिल बनाने लगीं। देखते ही देखते परिवहन का यह साधन फिटनेस की रखवाली में भी काम आने लगा।
आज फिटनेस और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन चुकी साइकिल कभी 10 रुपये में मिला करती थी और इस पर लाइसेंस और कर लगता था। आज इस सवारी की कीमत लाखों तक पहुंच गई हैं।