म्युज़िक के शौकीन उसे कानो से सुनते हैं और दिल में महसूस करते हैं। हम में से अधिकतर पाते हैं कि कोई भी गाना सुनते समय ऐसा लगता है कि वह गाना हमारे लिए ही बना है।

नेचर रिव्यूज़ न्यूरोसाइंस में प्रकाशित एक नए शोध से पता चला है कि संगीत न केवल कानों से जुड़ा है, बल्कि मस्तिष्क और शरीर से भी जुड़ा है, जिसकी व्याख्या न्यूरल रेजोनेंस थ्योरी (एनआरटी) द्वारा की गई है।
इस सिद्धांत के अनुसार, हमारी मस्तिष्क तरंगें संगीत की लय और धुन के साथ तालमेल बिठाती हैं, और यह सामंजस्य गाने को व्यक्तिगत, परिचित और मार्मिक बनाता है।
एनआरटी (Neural Resonance Theory) कहती है कि मस्तिष्क तरंगें अलग-अलग गति से सुनी जाने वाली ध्वनियों के साथ तालमेल बिठाती हैं। धीमी ध्वनियाँ, जैसे संगीत की धड़कनें, एक लय बनाती हैं जिसके साथ आप नाच सकते हैं या खेल सकते हैं। कॉर्टेक्स में न्यूरॉन्स उन आवृत्तियों पर दोलन करते हैं जो संगीत की उन तरंगों के साथ प्रतिध्वनित होती हैं।
कनाडा के मैकगिल विश्वविद्यालय की न्यूरोसाइंटिस्ट कैरोलीन पामर ने एक बयान में कहा, “यह सिद्धांत बताता है कि संगीत सिर्फ़ इसलिए शक्तिशाली नहीं है क्योंकि हम इसे सुनते हैं, बल्कि इसलिए भी कि हमारा मस्तिष्क और शरीर संगीत बन जाते हैं। इसका चिकित्सा, शिक्षा और तकनीक पर गहरा प्रभाव पड़ता है।”
यह सिद्धांत संगीत को सीधे हमारे व्यक्तित्व, भावनाओं और शारीरिक प्रतिक्रियाओं से जोड़ता है, इसलिए कुछ गाने हमारे मस्तिष्क की आवृत्ति से मेल खाते हुए, हमारे अपने लगते हैं।
यह खोज संगीत की अनुभूति को समझने के साथ-साथ चिकित्सा, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य में संगीत के उपयोग की नई संभावनाएँ पैदा करती है।
