लाल क़िले पर पहली बार राष्ट्र गान से पहले गूंजा राष्ट्र गीत

देश आज अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आज़ादी के बाद से इस स्वंत्रता दिवस पर पहली बार रवींद्रनाथ टैगोर लिखित राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाया गया।

नए प्रोटोकॉल के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल क़िले पहुँचने पर सबसे पहले राष्ट्रीय गीत बजाया गया और इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। ध्वज फहराने के समय राष्ट्रगान बजाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले से अपने संबोधन में कहा, ‘आज़ादी के बाद यह पहली बार है, जब लाल किले पर ‘वंदे मातरम’ बजाया गया है।’

गौरतलब है कि इस स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और उसके समापन पर भी ‘वंदे मातरम’ बजाया गया। बताते चलें कि हाल ही में वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को राष्ट्रगान के समान क़ानूनी संरक्षण दिया गया है।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने क़ानून में संशोधन करते हुए पिछले दिनों ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के बराबर दर्जा दिया है। अभी तक राष्ट्रीय गीत को सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान बजाया जाता था जबकि राष्ट्रगान को सरकारी और राजकीय समारोहों में बजाया जाता था।

रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में घोषणा की थी कि ‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष को यादगार बनाने के लिए पहली बार इसे विशेष सम्मान दिया जाएगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुतबिक, संशोधित क़ानून के अनुसार, राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम 1971 जिसे संसद द्वारा पारित किए जाने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिली, राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर भी तीन साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है, जैसा कि राष्ट्रगान के अपमान के मामले में होता है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर ने पोस्ट साझा करते हुए अपनी बात रखी है जिसमे उनका कहना है कि वह दोनों का बहुत सम्मान करते हैं और ‘वंदे मातरम’ के पहले दो पद गा सकते हैं लेकिन इसके बाक़ी चार पद नहीं, क्योंकि अब तक उन्हें गाना अनिवार्य नहीं था।

थरूर ने आगे लिखा है, ‘जन गण मन के दौरान लोगों को सम्मानपूर्वक खड़े होकर क़रीब 52 सेकंड तक ध्यान केंद्रित रखना होता है। वहीं ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण तीन मिनट 10 सेकंड का है। तमिलनाडु ने अभी फ़ैसला किया है कि इन दोनों से पहले राज्य गीत ‘तमिल थाई वाज़्थु’ भी गाया जाएगा, जो क़रीब दो मिनट का है।’

आगे उन्होंने जो मुद्दा सामने रखा है वह इस तरह है, ‘क्या हम सचमुच उम्मीद करते हैं कि हर समारोह की शुरुआत और अंत में लोग क़रीब छह मिनट तक स्थिर खड़े रहकर सम्मानपूर्वक इन गीतों को सुनेंगे? यानी हर समारोह में कुल 12 अतिरिक्त मिनट? क्या सम्मान और धैर्य को क़ानून बनाकर लागू किया जा सकता है? मुझे डर है कि विधेयक का मक़सद यानी राष्ट्रीय गीत के प्रति अधिक सम्मान पैदा करना, पूरा नहीं होगा। बल्कि इसका उल्टा असर हो सकता है।’

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