तीन तलाक मानवाधिकार का मुद्दा- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (14 फरवरी) को कहा कि वह तीन तलाक, ‘निकाह हलाला’ और मुसलमानों के बीच बहुविवाह की प्रथाओं के “कानूनी” पहलुओं पर फैसला करेगा। Triple talaq

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह मुस्लिम लॉ के तहत तलाक पर विचार नहीं करेगा, क्योंकि यह विधायी डोमेन में आता है।

चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस एनवी रमणा और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने मंगलवार को कहा कि ये एक ऐसा मामला है, जिसमें मानवाधिकार का मुद्दा भी हो सकता है।

यह दूसरे मामलों पर भी असर डाल सकता है। हम इस मामले में कॉमन सिविल कोड पर बहस नहीं कर रहे।

कोर्ट मामले में कानूनी पहलू पर फैसला देगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह एक आदेश पारित करेगा और तीन तलाक की वैधता से जुड़ी याचिकाओं का निपटारा 11 मई तक कर देगा।

सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों (पार्टियों के) से कहा कि वह साथ बैठें मुद्दे को अंतिम रूप दें। हम मुद्दों पर फैसला करने के लिए इस मुद्दे को परसों के लिए लिस्ट कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे से जुड़े लोगों को साफ किया कि वह इस मामले में किसी विशेष केस के तथ्यात्मक पहलुओं पर विचार नहीं करेगा। वह सिर्फ कानूनी मुद्दे को देखेगा।

पीठ ने कहा कि हमारी तथ्यों को देखने में रुचि नहीं है। हम सिर्फ इसके कानूनी पहलुओं को देखेंगे। हालांकि कोर्ट ने वकीलों को एेसे लोगों का एक छोटा संक्षेप लाने की इजाजत दी, कथित तौर पर तीन तलाक के कारण पीड़ित हैं।

इससे पहले केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में मुस्लिमों में लिंग अनुपात और सांप्रदायिकता का हवाला देकर तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह का विरोध किया था।

 केंद्र ने कहा था कि लैंगिक समानता और महिलाओं के मान सम्मान के साथ समझौता नहीं हो सकता और भारत जैसे सेक्युलर देश में महिला को जो संविधान में अधिकार दिया गया है उससे वंचित नहीं किया जा सकता।

इसके बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में एक और हलफनामा दाखिल कर केंद्र की दलीलों का विरोध किया था। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने हलफनामे में कहा था कि ट्रिपल तलाक को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन बताने वाले केंद्र सरकार का रुख बेकार की दलील है। पर्सनल लॉ को मूल अधिकार के कसौटी पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

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