हिमालय रेंज में हमेशा भूकंप का खतरा बना रहता है

नेपाल में भूकंप के समाचार मिले हैं। इससे पहले असम और कोलकाता में भी भूकंप ने हलचल मचा दी थी। इन भूकंप का असर भारत सहित तिब्बत, भूटान, पकिस्तान और बंगाल की खाड़ी तक महसूस किया गया है। हिमालय रेंज में हमेशा से ही भूकंप का खतरा बना रहता है। इस खतरे को देखते हुए हिमालय, उसके समीप और दुरश्त इलाक़ों को संवेदनशीलता के अनुसार कई ज़ोन में बाँट दिया गया है।

हिमालय रेंज में हमेशा भूकंप का खतरा बना रहता है

गुरुवार आधी रात के बाद करीब 2.36 बजे आए भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 5.5 मापी गई। नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के मुताबिक भूकंप का केंद्र धरती से 10 किलोमीटर की गहराई में रहा। नेपाल की सीमा के समीप बिहार के कई जिलों में इस भूकंप के झटके महसूस किए गए। पाकिस्तान में भी शुक्रवार सुबह रिक्टर पैमाने पर 4.5 तीव्रता का भूकंप आया, जिसमें भूकंप की गहराई 10 किमी बताई गई है।

भूकंप के झटके लगने से लोग सहम गए। दहशत के चलते लोग अपने घरों से बाहर निकल आए। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 5.5 मापी गई। इस भूकंप में जानमाल के नुकसान या किसी के हताहत होने का समाचार नहीं है।


धरती के नीचे स्थित प्लेट हमेशा चलती रहती हैं। घर्षण के कारण वे अपने किनारों पर अटक जाती हैं। ऐसे में किनारे पर पड़ रहा तनाव फ्रिक्शन के फोर्स से ज्यादा हो जाता है, तो रिलीज होने वाली एनर्जी लहर के रूप में धरती की परत से होकर गुजरती है और कंपन का एहसास कराती है।


भारत सहित नेपाल और तिब्बत हमेशा से भूकंप को लेकर संवेदनशील क्षेत्र रहे हैं। रिपोर्ट्स बताती है कि नेपाल में एक महीने में 5 जबकि तिब्बत में 39 बार भूकंप आए हैं।

इस क्षेत्र में होने वाली हलचलों का कारण वैज्ञानिक बार-बार बताते रहते हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि हिमालय पर्वत श्रृंखला आकरीब 40-50 मिलियन साल पहले बनी दो प्लेटें, यूरेशियन और भारतीय प्लेट एक दूसरे के समीप आकर आपस टकराने लगीं। इन दोनों प्लेटों का घनत्व (ensity)समान होने के कारण इनकी आपस में टक्कर से वहां से जमीन ऊपर उठ गई। और इस तरह हिमालय अस्तित्व में आया।

गुज़रते समय के साथ यूरेशियन प्लेट नीचे की ओर खिसक गई। इस खिसकने में यह भारतीय प्लेट के नीचे आ गई। यह प्रक्रिया अब भी जारी है। हिमालय जोन में बार-बार आने वाले भूकंप का मुख्य कारण भारतीय और यूरेशिया प्लेटों के आपस में टकराव के कारण हैं।

यह दोनों प्लेटें हर साल 40-50 मिमी की तुलनात्मक गति से एक-दूसरे के उपर मूव कर रही हैं। जहाँ एक और भारतीय प्लेट हिमालय के नीचे दब रही है, वहीं यूरेशियन प्लेट पामीर पर्वतों के दबाव में है।

अध्ययन बताते हैं कि धरती के नीचे स्थित ये प्लेट हमेशा धीरे-धीरे चलती रहती हैं। घर्षण के कारण वे अपने किनारों पर अटक जाती हैं। ऐसे में जब किनारे पर पड़ रहा तनाव फ्रिक्शन के फोर्स से ज्यादा हो जाता है, तो रिलीज होने वाली एनर्जी लहर के रूप में धरती की परत से होकर गुजरती है और कंपन का एहसास कराती है। यह कंपन ही भूकंप है जिसे रिक्टर स्केल पर नापा जाता है।

एक अध्ययन से पता चला है कि यूरेशियन प्लेट से टकराने वाली भारतीय प्लेट तिब्बत के नीचे धीरे-धीरे टूट रही है। इस प्रक्रिया को “स्लैब टियर” नाम दिया गया है। इस प्रक्रिया में भारतीय प्लेट की ऊपरी परत अपनी निचली परत से अलग हो जाती है, जिससे क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूकंपीय गतिविधि जन्म लेती है। ऐसे में दोनों प्लेटों के जोड़ पर स्थिति पूरा क्षेत्र भूकंप को लेकर लगातार संवेदनशील बना हुआ है।

याद दिला दें कि इस वर्ष की शुरुआत में ही तिब्बत 7.1 तीव्रता का भूकंप आया। इस भूकंप में करीब 126 लोगों की जान चली गई थी।

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