दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड, A23a, तेज़ी से टूटकर कई बड़े टुकड़ों में बँट रहा है। इसके टूटने के बाद 3,000 वर्ग किलोमीटर का एक अलग हिमखंड A23a ही रहा है। वास्तव में, A23a अब खुद भी टूटकर छोटे टुकड़ों में बँट गया है, और उसका क्षेत्रफल करीब 3,500 वर्ग किमी से घटकर लगभग 1,700 वर्ग किमी रह गया है।

ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण (BAS) के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस हिमखंड का वज़न कभी एक ट्रिलियन मीट्रिक टन था और यह 3,672 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला था, जो अमरीकी राज्य रोड आइलैंड से भी बड़ा है।
वैज्ञानिक एंड्रयू मेजर्स का कहना है कि A23a वर्तमान में बड़े टुकड़ों में टूट रहा है, जिन्हें अमरीकी राष्ट्रीय हिम केंद्र द्वारा नए हिमखंडों के रूप में भी दर्ज किया गया है, और इसका क्षेत्रफल अब घटकर 1,700 वर्ग किलोमीटर रह गया है, जो लंदन शहर के समीप है।
यूरोपीय संघ के अर्थ ऑब्ज़र्वेशन मॉनीटर कॉपरनिकस द्वारा उपग्रह चित्रों के विश्लेषण के अनुसार, अब इसका आकार अपने मूल आकार के आधे से भी कम रह गया है, लेकिन अभी भी इसका आकार 1,770 वर्ग किलोमीटर (683 वर्ग मील) है तथा इसकी चौड़ाई 60 किलोमीटर (37 मील) है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले हफ़्तों में गर्म पानी के कारण यह हिमखंड छोटे टुकड़ों में टूट जाएगा। यह हिमखंड 1986 में अंटार्कटिका के फॉल्कनर रूनी आइस शेल्फ से टूटकर अलग हुआ था और 30 से ज़्यादा वर्षों तक वेडेल सागर की तलहटी में जमा रहा।
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के एंड्रयू मीजर्स ने बताया कि, अब ब्रिटेन का D15A दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड बन गया है। NASA की तस्वीरों से पता चला है कि A23A से हाल ही में कुछ और छोट-छोटे टुकड़े अलग हुए हैं जिसे A23D, A23E और A23F नाम दिया गया है।
एंड्रयू मीजर्स ने मीडिया को बताया कि जैसे-जैसे यह उत्तर की ओर बढ़ रहा था, यह काफी नाटकीय ढंग से टूट रहा था। उन्होंने कहा- “मैं कहूँगा कि यह लगभग ख़त्म होने की कगार पर है… यह अंदर से सड़ रहा है। पानी इतना गर्म है कि इसे बनाए रखना मुश्किल है। यह लगातार पिघल रहा है।” उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले सप्ताहों में यह वास्तव में पहचाना नहीं जा सकेगा।
A23a के टूटने के बाद, दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड अब D15a है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 3,000 वर्ग किलोमीटर है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमखंडों का टूटना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन हाल के दशकों में जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्री तापमान के कारण यह प्रक्रिया तेज़ हो गई है।









