सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट एक फैसले को बीते दिन खारिज कर दिया। इस फैसले में उत्तर प्रदेश विधान परिषद और विधानसभा सचिवालयों की भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई जांच को अंतिम उपाय माने जाने की बात कही है। जस्टिस विजय बिश्नोई और जस्टिस जे के माहेश्वरी की पीठ का कहना है कि सीबीआई को जांच का निर्देश देने की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग संयम के साथ और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई द्वारा जांच कराने का निर्देश देने वाले आदेश को अंतिम उपाय माना जाना चाहिए, जो तभी उचित होगा जब संवैधानिक न्यायालय को यह विश्वास हो कि प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा से समझौता किया गया है या उसके पास यह मानने के कारण हों कि इसमें इस हद तक समझौता हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने विधान परिषद उत्तर प्रदेश, लखनऊ और अन्य द्वारा दायर अपील पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि इस अदालत ने लगातार चेतावनी दी है कि सीबीआई जांच को नियमित रूप से या केवल इसलिए निर्देशित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि कोई पक्ष कुछ आक्षेप लगाता है या राज्य पुलिस में व्यक्तिपरक अविश्वास रखता है।
शीर्ष अदालत ने विधान परिषद उत्तर प्रदेश, लखनऊ और अन्य द्वारा दायर एक अपील पर यह निर्णय पारित किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “उपर्युक्त चर्चा के मद्देनजर वर्तमान अपीलें स्वीकार की जाती हैं और उच्च न्यायालय द्वारा 18 सितंबर, 2023 के आदेश… और 3 अक्टूबर, 2023 के आदेश को रद्द किया जाता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि इस शक्ति का प्रयोग करने के लिए, संबंधित न्यायालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रस्तुत मटेरियल प्रथम दृष्टया अपराध के घटित होने का खुलासा करती है और निष्पक्ष जांच के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सीबीआई जांच आवश्यक बनाती है।
सीबीआई द्वारा जांच कराने का निर्देश देने वाले आदेश को अंतिम उपाय मानने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह तभी उचित लगेगा जब संवैधानिक न्यायालय को यह विश्वास हो कि प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा से समझौता किया गया है या उसके पास यह मानने के कारण हों कि इसमें इस हद तक समझौता हो सकता है।
अदालत ने अपनी बात में इस तथ्य का हवाला भी दिया कि जब स्थानीय पुलिस के आचरण से नागरिकों के मन में निष्पक्ष जांच करने की उनकी क्षमता के बारे में उचित संदेह की स्थिति हो या जब कोर्ट के संज्ञान में लाई गई मटेरियल प्रथम दृष्टया प्रणालीगत विफलता, उच्च पदस्थ राज्य अधिकारियों या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों की संलिप्तता की ओर इशारा करें, उस समय भी यह संभव है।












