वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड सहित अन्य ग्रीनहाउस गैस की मात्रा बीते वर्ष 2025 में अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गई। इसका प्रभाव कई सदियों तक जारी रहने का अनुमान है। रुझान बताते हैं कि इससे वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी के साथ तूफ़ान, सूखा, बाढ़ और भीषण गर्मी जैसी चरम मौसम घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
यूएन एजेंसी प्रमुख ने चेतावनी दी है कि कार्बन डाइऑक्साइड लम्बे समय तक वायुमंडल में बनी रहती है और इसलिए जलवायु पर इसका असर दशकों और सदियों तक बने रहने की आशंका है।
अपने एक नए विश्लेषण में यह जानकारी विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ओर से साझा की गई है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, वायुमंडल में गर्मी को रोक कर रखने वाली गैस, ग्रीनहाउस गैस की सघनता निरन्तर बढ़ती जा रही है।
2025 में कार्बन डाऑक्साइड की सघनता 426.8 पार्ट्स प्रति मिलियन; मीथेन की 1,948 पार्ट्स प्रति बिलियन; और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा 339.1 पार्ट्स प्रति बिलियन आंकी गई।
डब्ल्यूएमओ की वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी ओक्साना तारासोवा ने आगाह किया कि 2026 में भी CO2 का स्तर बढ़ने की आशंका है। अल नीन्यो धरती की कार्बन सोखने की क्षमता को और कमज़ोर कर सकता है।
वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि की दर 1960 के वर्षों की तुलना में तीन गुना हो गई है। इसकी मात्रा वर्ष 1750 के स्तर की तुलना में 153 प्रतिशत है। मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा ने भी 2025 में नई ऊँचाइयों को छुआ है। मानव गतिविधियों से जनित ये गैस वातावरण में लम्बे समय तक बने रहने के मामले में दूसरे व तीसरे स्थान पर हैं। रिकॉर्ड पर पिछले 11 वर्ष सबसे अधिक गर्म साबित हुए हैं और यह रुझान आगे भी जारी रहने की प्रबल सम्भावना है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार, वर्ष 2004 में उसके पहले ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन के समय वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की औसत मात्रा 377.5 पार्ट्स प्रति मिलियन (ppm) थी जो अब बढ़कर लगभग 427 ppm हो गई है।
यूएन एजेंसी की उपमहासचिव को बैरेट ने जिनीवा में पत्रकारों को बताया कि कार्बन डाइऑक्साइड की थोड़ी-सी बढ़ोत्तरी भी वातावरण में अतिरिक्त गर्मी को रोक कर रखती है। उनके अनुसार, इससे महासागर और वायुमंडल तेज़ी से गर्म हो रहे हैं। नतीजतन, भीषण गर्मी, उष्णकटिबन्धीय चक्रवात और भारी बारिश जैसी घटनाएँ पिछले अनुमानों से कहीं तेज़ी से गम्भीर हो रही हैं।
चिन्ता की बात यह भी है कि लम्बे समय तक वायुमंडल में बनी रहने वाली दो अन्य प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का स्तर भी 2025 में रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँच गया।
रिपोर्ट बताती है कि हर साल एक नया रिकॉर्ड बन रहा है। ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में पहले से कहीं अधिक गर्मी रोक रही हैं, जिससे चरम मौसम की घटनाएँ और लोगों व अर्थव्यवस्थाओं के लिए ख़तरे बढ़ रहे हैं। पिछले 11 वर्ष अब तक के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं और यह सिलसिला जारी रहने की आशंका है।
चिंता बढ़ाते आंकड़े
वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने की रफ़्तार 1960 के दशक से तीन गुना हो गई है। तब इसकी मात्रा हर साल औसतन 0.8 पार्ट्स प्रति मिलियन (ppm) बढ़ती थी, जबकि 2011 से 2020 के दशक के बीच यह वृद्धि 2.4 ppm प्रति वर्ष रही।
डब्ल्यूएमओ की वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी ओक्साना तारासोवा के अनुसार, 2023 से 2024 के बीच CO2 की मात्रा रिकॉर्ड 3.5 ppm बढ़ी। इस दौरान शक्तिशाली मौसमी प्रभावों ‘अल नीन्यो’ के कारण सूखा और जंगलों में आग की घटनाएँ बढ़ीं, जिससे प्राकृतिक तंत्रों की कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता कम हो गई।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 से 2025 के बीच CO2 की मात्रा में 2.8 ppm की वृद्धि हुई, जो पिछले वर्ष से कम थी। इसके बावजूद जीवाश्म ईंधन जलाने से वायुमंडल में बड़ी मात्रा में कार्बन जमा हुआ।
कार्बन डाई ऑक्साइड बढ़ने की रफ़्तार तीन गुना
डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में हर साल उत्सर्जित होने वाली ग्रीनहाउस गैसों के बजाय वायुमंडल में जमा उनकी कुल मात्रा का आकलन किया गया है।
हर साल उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग आधा हिस्सा वायुमंडल में रह जाता है, जबकि बाक़ी को जंगल, पेड़-पौधे और महासागर सोख लेते हैं।
अमरीका के राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के अनुसार, 1990 से 2025 के बीच ग्रीनहाउस गैसों का पृथ्वी को गर्म करने वाला प्रभाव 56 प्रतिशत बढ़ा। इस बढ़ोत्तरी में लगभग 81 प्रतिशत योगदान कार्बन डाइऑक्साइड का था।
वैज्ञानिक इसे ‘विकिरण बल’ (Radiative Forcing) कहते हैं, जो पृथ्वी को गर्म करने में ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को दर्शाता है।
अन्य गैस पर ध्यान भी ज़रूरी
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने चेतावनी दी है कि कार्बन उत्सर्जन घटाने के प्रयासों में देशों को हाइड्रोजन (H2) और सल्फ़र हैक्साफ़्लोराइड (SF6) जैसी गैसों पर भी ध्यान देना होगा. वायुमंडल में इनकी मात्रा कम है, लेकिन ये जलवायु को प्रभावित कर सकती हैं।
सल्फ़र हैक्साफ़्लोराइड का इस्तेमाल बिजली वितरण उपकरणों में चिंगारी रोकने के लिए होता है। दुनिया भर में बिजली का उपयोग बढ़ने के साथ, पिछले तीन दशकों में इस गैस का इस्तेमाल भी बढ़ा है।
संगठन के अनुसार, यह गैस वायुमंडल में 1,000 वर्षों से अधिक समय तक बनी रह सकती है और 100 वर्षों की अवधि में इसकी पृथ्वी को गर्म करने की क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड से लगभग 24,300 गुना अधिक है। साल 2025 में वायुमंडल में SF6 की मात्रा में अब तक की सबसे बड़ी वार्षिक बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।
वर्ष 2010 से 2024 के बीच वायुमंडल में हाइड्रोजन की मात्रा 5.3 प्रतिशत बढ़ी है। हाइड्रोजन का इस्तेमाल इस्पात उत्पादन और समुद्री परिवहन में कार्बन उत्सर्जन घटाने, नवीकरणीय ऊर्जा के भंडारण और वाहनों के ईंधन के रूप में हो रहा है।