अफ्रीका महाद्वीप का नक्शा इस बात के संकेत दे रहा है कि अब यहाँ की धरती में बढ़ती दरार एक नये महासागर को जा रही है। दुनियाभर के भूगर्भ वैज्ञानिक इस घटना के लेकर हैरान हैं और इस पर लगातार नज़र रखे हैं।

अफ्रीका महाद्वीप इस समय एक ऐसी असाधारण जियो-लॉजिकल घटना से गुज़र कर रहा है। इस संबंध में वैज्ञानिकों का आकलन है कि पूर्वी अफ्रीका में महाद्वीप के टूटने के निशान नज़र आने लगे हैं। इस विभाजन वैज्ञानिक ‘ग्रेट रिफ्ट वैली’ कह रहे हैं।
एविडेंस नेटवर्क में प्रकाशितअपने एक लेख में रिसर्चर वैज्ञानिक डॉक्टर रोसालिया नेवे कहती हैं कि पूर्वी अफ्रीका में महाद्वीप के टूटने के निशान दिखने लगे हैं। उन्होंने इस विभाजन को ‘ग्रेट रिफ्ट वैली’ कहा है, जो उत्तर से दक्षिण तक करीब 6,000 किलोमीटर तक फैली हुई है।
यह उत्तर से दक्षिण तक करीब 6,000 किलोमीटर तक फैली हुई है। इस क्षेत्र में धरती की सतह धीरे-धीरे दरक रही है। नीचे से उठने वाली मैग्मा परतें इस प्रक्रिया को और तेज कर रही हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जब यह परत पूरी तरह टूट जाएगी, तो समुद्र का पानी इस दरार में भर जाएगा और एक नया महासागर अस्तित्व में आ जाएगा। इस नए सागर का विस्तार अफार क्षेत्र से लेकर केन्या और तंजानिया की सीमा तक होगा, जिससे हॉर्न ऑफ अफ्रीका एक विशाल द्वीप में बदल जाएगा।
इथियोपिया में साल 2005 में आने वाले एक भूकंपीय घटनाक्रम ने वैज्ञानिकों को इस धारणा से अवगत कराया। हुआ यह था कि उस समय कुछ ही मिनटों में 60 किलोमीटर लंबी दरार बन गई और जमीन लगभग दो मीटर तक अलग हो गई। वैज्ञानिक इस बात पर हैरान थे कि जिस दरार को बनने में कई सदियों का वक्त लगता है, वह कुछ ही सेकंड में बन गई। इसी आधार पर अब वैज्ञानिकों का मानना है कि जब ये प्रक्रिया तेज होगी तो बेहद काम समय में यह काम अपने अंजाम तक पहुँच जाएगा।
दरअसल ये प्रक्रिया पूर्वी अफ्रीका में हो रही है, जहां तीन प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं और धीरे-धीरे अलग हो जाती हैं। वैज्ञानिकों को इस बात का एहसास है कि टेक्टोनिक फोर्स ने अफ्रीका भू-भाग को चीरना शुरू कर दिया है। अब साफ नज़र आने लगा है कि अफ्रीका महाद्वीप के टूटने के साथ बीच में एक नये महासागर का निर्माण शुरू हो गया जो हैरान करने वाली घटना है।
रिसर्चर वैज्ञानिक डॉक्टर रोसालिया नेवे के मुताबिक़, इस क्षेत्र में धरती की सतह धीरे-धीरे फट रही है और नीचे से उठती हुई गर्म मैग्मा परतें इस प्रक्रिया को और तेज कर रही हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, किलिमंजारो जैसे विशाल ज्वालामुखी पर्वत इस भूगर्भीय कहानी के सबूत हैं, जो आज से करीब 2.5 करोड़ वर्षों से जारी महाद्वीपीय परिवर्तन का प्रतीक रहे हैं।
लेख बताता है कि पूर्वी अफ्रीका का यह इलाका तीन प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों, 1- सोमालियन प्लेट, 2- अफ्रीकन प्लेट और 3- अरेबियन प्लेट के संगम पर स्थित है। यह भू-स्थितियां महाद्वीपीय रिफ्टिंग के लिए एक शानदार परिस्थितियां बनाती हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सोमालियन प्लेट हर साल कुछ मिलीमीटर की गति से पूर्व दिशा की तरफ खिसक रही है, जिससे धरती की परत धीरे-धीरे खिंच रही है।
सैटेलाइट एवं जीपीएस तकनीक से प्राप्त तथ्य बताते हैं कि फ़िलहाल यह प्रोसेस बहुत धीमा है, लेकिन ये लगातार घट रहा है। इस विभाजन से धरती की सतह खिंचकर पतली हो रही है जिससे इसके टूटने की रफ्तार काफी ज्यादा बढ़ जाएगी। हालाँकि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस प्रक्रिया में कई सौ साल लगेंगे, लेकिन जिस समय यह प्रक्रिया तेज होगी, तब इसके पूरा होने में मात्र कुछ सेकंड्स या मिनट का समय ही लगेगा।










