दुनिया भर में लगभग तीन अरब लोग पर्याप्त आवास से वंचित हैं। संयुक्त राष्ट्र की पर्यावास एजेंसी – यूएन पर्यावास ने चेतावनी दी है कि बढ़ती असमानता, जलवायु परिवर्तन का दबाव और तेज़ नगरीकरण, दुनिया भर में आवास संकट को और गम्भीर बना रहे हैं। इसका सबसे अधिक असर अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लाखों लोगों पर पड़ रहा है, जो बढ़ते जोखिमों का सामना कर रहे हैं।

यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में यूएन पर्यावास की कार्यकारी निदेशक अनाक्लॉदिया रोसबाख़ ने बताया कि जो समस्या कभी मुख्य रूप से विकासशील देशों तक सीमित मानी जाती थी, वह अब अमीर और ग़रीब सभी देशों को प्रभावित करने वाला वैश्विक संकट बन गई है। एजेंसी का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए सस्ते, जलवायु-सहिष्णु आवास और समावेशी शहरी योजना की तत्काल आवश्यकता है।
यूएन न्यूज़ के अनुसार दुनिया भर में लगभग तीन अरब लोगों के पास पर्याप्त आवास नहीं है। अनाक्लॉदिया रोसबाख़, वैश्विक दृष्टिकोण से आज के आवास संकट का सबसे बड़ा कारण असमानता और ग़रीबी को बताती हैं। किराए पर घर लेने, ख़रीदने या अपने घर में टिके रहने के लिए, लोगों के पास पर्याप्त धन नहीं होता।
दक्षिण एशिया दुनिया में सबसे तेज़ी से हो रहे नगरीकरण वाले क्षेत्रों में से एक है। यहाँ शहरी विकास अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण है और इस पर अनाक्लॉदिया रोसबाख़ कहती है कि हम कई संकटों के दौर से गुज़र रहे हैं, जो हमारे ग्रह पर बढ़ता दबाव डाल रहे हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण जलवायु संकट है। वह कहती हैं कि जलवायु से जुड़ी घटनाएँ अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं, और उनका सबसे ज़्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जो पहले से ही असुरक्षित परिस्थितियों में रह रहे हैं।
एक सवाल के जवाब में अनाक्लॉदिया बताती हैं कि आज आवास से जुड़ी सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यह एक साझा वैश्विक चुनौती बन चुकी है। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम सभी क्षेत्रों के देशों को प्रभावित कर रही है।
बातचीत से पता चलता है कि दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ लोग बेघर हैं। यह स्थिति विकसित और विकासशील दोनों क्षेत्रों में दिखाई देती है, योरोप, अमरीका और कैनेडा के शहरों से लेकर भारत व ब्राज़ील तक।
यहाँ यह पहलू भी सामने आता है कि आवास की समस्याएँ रूप में भले अलग हों, लेकिन उनकी जड़ें समान हैं। किफ़ायती आवास सबसे बड़ी कमी बना हुआ है, और अब यह संकट केवल वैश्विक दक्षिण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक उत्तर को भी प्रभावित कर रहा है।
अनाक्लॉदिया का कहना है कि इससे जुड़ी सिफ़ारिशों में कहा गया है कि अनौपचारिक बस्तियों को राष्ट्रीय शहरी नीतियों का मूल हिस्सा माना जाना चाहिए।
