भारत ने उन्नत जैव विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के मक़सद से जैव प्रौद्योगिकी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। इसके लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) के सहयोग से महत्वाकांक्षी योजना पर काम होगा।

जैव प्रौद्योगिकी के तहत शुरू की जाने वाली इस BioE3 नीति मे पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और रोजगार को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य उन्नत जैव विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए सुविधाएं प्रदान करना है। इसके अलावा 2030 तक 300 बिलियन डॉलर की जैव अर्थव्यवस्था के भारत के लक्ष्य में योगदान का भी लक्ष्य रखा गया है।
भारत के पहले राष्ट्रीय बायोफाउंड्री नेटवर्क के शुभारंभ की घोषणा विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा की गई। इस पहल का उद्देश्य बायोटेक्नोलॉजी को देश की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार क्षेत्र का प्रमुख प्रेरक बनाना है।
नए नेटवर्क की स्थापना 26 मई 2023 को हों वाले समझौते के तहत की गई थी। इससे पूरे भारत में 21 जैव-सक्षम सुविधाओं के प्रतिनिधित्व के साथ स्टार्ट-अप, लघु और मध्यम उद्यमों (एसएमई), उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों को साझा बुनियादी ढांचा और पायलट पैमाने के प्लेटफॉर्म प्रदान किए जाने की योजना है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, 21 से अधिक बायो-फाउंड्री पहले से ही चालू हैं और 4,000 से अधिक बायोटेक स्टार्ट-अप्स के साथ, भारत अब वैश्विक बायोटेक पावरहाउस के रूप में स्थापित हो गया है।
गौरतलब है कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था एक दशक पहले सिर्फ 10 अरब डॉलर थी, जो अब 2030 तक 300 अरब डॉलर तक पहुंचने की राह पर है। जानकारी में कहा गया है कि ये केंद्र पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करेंगे, स्थायी विकल्प तैयार करेंगे और भारत के भू-राजनीतिक सशक्तीकरण में योगदान देंगे। इस साल के अंत लगभग 100 केंद्र बनाने की योजना है।
इस पहल को भारत की जैव अर्थव्यवस्था के लिए ऐतिहासिक क्षण बताते हुए डीबीटी सचिव राजेश एस गोखले ने कहा कि अब चुनौती प्रयोगशाला नवाचारों को औद्योगिक रूप से बढ़ाने की है। कुछ सबसे उन्नत परियोजनाओं का ज़िक्र करते हुए उन्होंने जिन क्षेत्रों का नाम लिया वह इस तरह हैं-
मुंबई में कोशिका चिकित्सा सुविधा
हैदराबाद में देश का पहला पशु स्टेम सेल भंडार
पुणे में mRNA-आधारित सटीक चिकित्सा का केंद्र
अंगुल में जिंदल स्टील द्वारा CO₂ पृथक्करण इकाई
गोखले ने आगे कहा कि जैव-विनिर्माण इस सदी की सबसे परिवर्तनकारी तकनीकों में से एक है। इस नेटवर्क के साथ उन्होंने ऐसी जड़ें तैयार किए जाने की बात कही जो भविष्य में जैव-अर्थव्यवस्था को पोषित और स्थिर करेंगी।
यह परियोजना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा करेगी, खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों को कम करेगी और आयात को कम करेगी।
जीव विज्ञान के एआई, इंजीनियरिंग और उन्नत सामग्रियों के साथ एकीकरण के साथ, ये केंद्र हरित रोजगार, सतत नवाचार और किफायती स्वास्थ्य सेवा समाधानों को बढ़ावा देने के लिए तैयार हैं।
विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि बायोफाउंड्री नेटवर्क, जैव प्रौद्योगिकी को आईटी और डिजिटल तकनीकों के साथ-साथ राष्ट्रीय विकास के एक स्तंभ के रूप में स्थापित करने की भारत की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
