फ़ैशन की चाहत में पहनने-ओढ़ने की होड़ पृथ्वी की जान ले सकती है- संयुक्त राष्ट्र महासचिव

फ़ैशन व कपड़ों की अनियंत्रित खपत का पर्यावरण पर गम्भीर असर हो रहा है, जिसे रोकने के लिए तुरन्त क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है। यूएन महासभा में आयोजित एक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने यह बात कही।

फ़ैशन की चाहत में पहनने-ओढ़ने की होड़ पृथ्वी की जान ले सकती है- संयुक्त राष्ट्र महासचिव

महासचिव गुटेरेश ने समस्या की विकरालता की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि हर एक सेकेंड में कचरे से लदे एक ट्रक के बराबर कपड़ों को या तो जला दिया जाता है या फिर कचरा निपटान स्थल (landfill) पर फेंक दिया जाता है।

प्रदूषण में फ़ैशन उद्योग की भी एक बड़ी भूमिका है। वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इसका क़रीब आठ फ़ीसदी योगदान है। टैक्सटाइल उत्पादन में अक्सर हज़ारों रसायनों का इस्तेमाल आम लोगों व पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं।

यूएन महासचिव ने आगाह किया- “यदि हमने अपनी कार्रवाई तेज़ नहीं की, तो पहनने-ओढ़ने की होड़ पृथ्वी की जान ले सकती है।” उन्होंने अपने सम्बोधन में कहा कि कपड़ों को तेज़ रफ़्तार से बनाया और फेंका जा रहा है, जोकि नएपन, तेज़ी और इस्तेमाल के बाद त्याग देने के व्यवासायिक मॉडल पर आधारित है।

इस वर्ष मनाए जा रहे अन्तरराष्ट्रीय दिवस पर फ़ैशन व बुने हुए वस्त्रों पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है। यूएन प्रमुख ने कहा कि टैक्सटाइल उत्पादन में अक्सर हज़ारों रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जोकि आम लोगों व पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं। साथ ही, भूमि व जल सहित अन्य संसाधनों का दोहन पारिस्थितिकी तंत्रों पर को प्रभावित करता है। इस सबके साथ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जलवायु संकट को बढ़ावा मिलता है।

फ़ैशन जगत में कचरा संकट पर चेतावनी देते हुए यूएन प्रमुख का कहना है कि यह एक बड़ी वैश्विक समस्या की ओर इशारा करता है। उनके अनुसार, कचरा, हर सैक्टर में एक बड़ा मुद्दा है जिसमे फ़ैशन एक विषैले हिमखंड का नुकीला हिस्सा भर है।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि इंसान हर साल करीब दो अरब टन कचरे का उत्पादन करता है। यूएन प्रमुख ने चिन्ता जताई कि ज़हरीले तत्वों से भरा कचरा हमारी मिट्टी, जल और हवा में समा रहा है और हम तक पहुँच रहा है, जिसका सर्वाधिक ख़ामियाज़ा निर्धनों को भुगतना पड़ता है।

हमारी धरती पर एक अरब से अधिक लोग ऐसी झुग्गी-झोपड़ियों व अनौपचारिक बस्तियों में निवास करते हैं, जहाँ कचरा प्रबन्धन की कोई व्यवस्था नहीं है और बीमारियाँ फैलती रहती हैं।

ग्लोबल साउथ का धनी जगत कचरे की बाढ़ ला रहा है। पुराने कम्पयूटर्स से लेकर एकल-इस्तेमाल वाली प्लास्टिक तक इस सबका हिस्सा है। इनमे एक बड़ा हिस्सा फैशन इंडस्ट्री की देन है।

अनेक देशों के पास इस कचरे के निपटान के लिए कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे प्रदूषण और कचरा बीनने वाले लोगों के लिए जोखिम भी बढ़ रहा है।

यूएन प्रमुख ने इस वर्ष की थीम का उल्लेख करते हुए कहा कि कपड़ों लोग कुछ बार पहनने के बाद जिन कपड़ों को फेंक देते हैं, उनकी खपत में कमी लानी होगी।

इस संबंध विशेषज्ञों का मानना है कि कपड़ों के इस्तेमाल की अवधि को दोगुना किए जाने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 44 प्रतिशत तक की कमी की जा सकती है।

महासचिव ने सचेत किया कि व्यवसायों को हरित दावे करने की लीपापोती से बचना होगा और कचरे में वास्तव में कमी लाने के लिए ठोस क़दम उठाने होंगे, जिसमें सप्लाई चेन में संसाधनों की दक्षता बढ़ाना एक अहम उपाय है।

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