शुक्रवार को दिए एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ‘महंगाई का दबाव किसी कर्मचारी और पेंशनभोगी के बीच अंतर नहीं करता है।’ अदालत के अनुसार महंगाई की भरपाई के लिए दिए जाने वाले भत्तों को बढ़ाते समय, सरकार सेवारत कर्मचारियों (नौकरी कर रहे) और पेंशनभोगियों के बीच भेदभाव नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने केरल राज्य और केरल राज्य सड़क परिवहन निगम द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए ये ये फैसला सुनाया। एक महत्वपूर्ण फैसले में जस्टिस प्रसन्ना बी वराले और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने सेवानिवृत्त लोगों के समानता के अधिकार को बरकरार रखा। इसे भेदभावपूर्ण और मनमाना बताते हुए पीठ ने कहा, ‘जब ये लाभ एक समान उद्देश्य के लिए दिए जाते हैं और महंगाई से जुड़े होते हैं, और महंगाई का दबाव किसी नौकरी कर रहे कर्मचारी और पेंशनभोगी के बीच भेदभाव नहीं करता, तो महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) को बढ़ाने के लिए अलग-अलग दरें तय करने का कोई तार्किक आधार नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा कि विचाराधीन सरकारी आदेश में डीए की दर में 14 प्रतिशत और डीआर में 11 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, जबकि दोनों का उद्देश्य महंगाई की वजह से नौकरी कर रहे कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को होने वाली परेशानी से राहत दिलाना है।
आगे पीठ ने यह भी कहा कि एक बार जब महंगाई के आधार पर कुछ भत्ते देने और उन्हें बढ़ाने का निर्णय ले लिया जाता है, तो सेवा कर रहे कर्मचारियों के लिए रिटायर हो चुके लोगों की तुलना में बढ़ोतरी की दर अधिक तय करना मनमाना होगा। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन बताया।
बेंच ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि यहां, रिटायर्ड कर्मचारी न केवल पेंशन के हकदार हैं, बल्कि वे महंगाई राहत के भी हकदार हैं, जिसे महंगाई के आधार पर समय-समय पर संशोधित किया जाता है। कोर्ट के अनुसार, ‘मुद्दा यह नहीं है कि उन्हें लाभ मिलना चाहिए या नहीं, बल्कि मुद्दा उन अलग-अलग दरों का है जिनसे वे लाभ दिए जा रहे हैं। केवल इस आधार पर कि पाने वाला अभी नौकरी में है या रिटायर हो चुका है।