टीचर से जुड़े एक आपत्तिजनक मीम को सर्कुलेट करने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर के एक बच्चे को दसवीं की परीक्षा में बैठने की इजाजत दे दी है। साथ जी अदालत ने स्कूल से निकले गए बच्चे के लिए भारतीय विद्यालय प्रमाण पत्र परीक्षा परिषद (CISCE) को एडमिट कार्ड जारी करने का निर्देश दिया।

गौरतलब है कि 6 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार और अन्य से एक नाबालिग लड़के के पिता की अर्जी पर जवाब मांगा था। लड़के को इंदौर के एक स्कूल ने टीचरों से जुड़ा एक आपत्तिजनक मीम शेयर करने के आरोप में निकाल दिया था।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के पिछले साल नवंबर के एक आदेश को याचिका में चुनौती दी गई थी, जिसमें स्कूल के उस फैसले को बरकरार रखा गया था जिसमें कक्षा 9 के 13 साल के छात्र को शैक्षणिक सत्र 2024-2025 के बीच में ही टर्मिनेट कर दिया गया था।
मामले की सुनवाई में जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने कहा कि बच्चे ने परीक्षा देने के लिए पहले ही सीआईएससीई में पंजीकरण करा लिया है और अगर उसे अनुमति नहीं दी गई तो उसका एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो जाएगा।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील निपुण सक्सेना ने कहा कि अगर कोर्ट लड़के को परीक्षा देने की इजाजत नहीं देता है, तो उसका एक एकेडमिक साल बर्बाद हो जाएगा। पीठ के सामने दलील में याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि लड़के को स्कूल से निकालना गलत सजा थी। उनका कहना था कि सुधार के कदम उठाने के बजाय, स्कूल प्रबंधन ने उसे स्कूल से निकाल दिया। सक्सेना ने कोर्ट को यह भी बताया कि लड़का ट्यूटर्स की मदद से घर पर ही प्राइवेट पढ़ाई कर रहा है।
हालाँकि स्कूल के वकील ने याचिकाकर्ता की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि लड़के ने जो किया है, उसके लिए उसे माफ नहीं किया जा सकता। विवाद के कारणों को मद्देनज़र रखते हुए स्कूल को याचिकाकर्ता के बेटे को दूसरे स्टूडेंट्स के साथ नहीं, बल्कि एक अलग कमरे में परीक्षा देने की आजादी है। साथ ही पीठ ने कहा कि स्कूल को बच्चे को सुधारने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी लेकिन उसने उसे बुरा लड़का मानकर निकाल दिया गया। पीठ ने कहा कि उसे सुधारने के बजाय, स्कूल ने उसे निकालने का फैसला किया और खुद को उससे अलग कर लिया।
