समय के साथ साइबर सिक्योरिटी को मज़बूत बनाना बेहद ज़रूरी है

दुनिया की लगभग तीन चौथाई आबादी ऑनलाइन हैं। या कह सकते हैं कि क़रीब साढ़े 5 अरब लोग आज इंटरनैट का प्रयोग करते हैं। इंटरनैट इस लिए आज बेहद अहम है क्यूंकि यह स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर वित्तीय बाज़ारों, और सार्वजनिक सेवाओं से लेकर चुनावों तक तमाम महत्वपूर्ण कामों से जुड़ा हुआ है।

क्यूंकि इंटरनेट का जाल अब दुनिया के लगभग हर कोने तक पहुँच चुका है, ऐसे में साइबर क्राइम ने भी अपने पैर पसारे हैं। जिसके नतीजे में साइबर सिक्योरिटी भी एक विशाल चुनौती बन चुकी है।

साइबर हमलों अन्तरराष्ट्रीय शान्ति के लिए उत्पन्न इन ख़तरों के बारे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बार-बार जानकारी दी गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि कोई भी देश अकेले इन जोखिमों का प्रबन्धन नहीं कर सकता।

संयुक्त राष्ट्र के निरस्त्रीकरण शोध संस्थान (UNIDIR) के विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि अब केवल तकनीकी सुधारों का दौर ख़त्म हो चुका है। बुनियादी ढाँचे पर सरकारी संलिप्तता वाले हमले बढ़ने के साथ, साइबर अपराध महामारी का रूप ले रहा है। इन हमलों से होने वाला नुक़सान कई ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया है।

अब ध्यान “साइबर सुरक्षा” से हटकर”साइबर मज़बूती” (Cyber Resilience) पर केन्द्रित हो गया है। इसका अर्थ है समाजों की वह सामूहिक क्षमता, जिससे वे, साइबर हमले सफल होने की स्थिति से निपटने के लिए ख़ुद को ढाल सकें और उससे उबर सकें।

ऐसे में अन्तरराष्ट्रीय संस्थान, ज़िम्मेदार देशों के व्यवहार के लिए तय किए गए 11 यूएन मानदंडों को ठोस रूप से लागू करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। प्रमुख पहलों में ‘वैश्विक सम्पर्क डायरेक्टरी’ शामिल है, जो घटनाओं के दौरान दबाव और तनाव कम करने के लिए सुरक्षित संचार चैनल बनाती है।

इसी क्रम में जल्द ही संयुक्त राष्ट्र का’सूचना व संचार प्रौद्योगिकी की सुरक्षा पर वैश्विक वैश्विक प्रणाली’ आरम्भ किया जाएगा। इस स्थाई मंच का उद्देश्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा और तकनीकी क्षमता साझा करने के मानकों को तय करना है।

वैश्विक समुदाय, विश्व आर्थिक मंच (WEF) और जिनीवा साइबर सप्ताह जैसे मंचों के ज़रिए यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है कि आधुनिक जीवन का आधार बना डिजिटल ढाँचा, तेज़ी से जटिल होते ख़तरों के बीच भी अडिग रहे।

निसन्देह व्यवसाय और देशों की सरकारें, वैश्विक सहयोग की तत्काल आवश्यकता को समझते हैं, मगर अनेक तरह की “दरारें” वैश्विक कार्रवाई में बाधा डाल रही हैं:

भू-राजनैतिक तनाव: दो-तिहाई संगठन अब अपनी साइबर रणनीति पर, राजनीति को सबसे बड़ा प्रभाव मानते हैं।
नियमों का उलझाव: तीन-चौथाई सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि परस्पर विरोधी वैश्विक नियम, क़ानूनों व दिशा निर्देशों पर अमल की कोशिशों को कठिन बनाते हैं।
लघु एवं मध्यम उद्योग (SME) – एक कमज़ोर कड़ी: बड़े संस्थानों की तुलना में छोटे व्यवसायों में सहनशीलता की कमी होने की सम्भावना दोगुनी होती है, फिर भी वे उन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का अभिन्न हिस्सा हैं जिन पर हम सभी निर्भर हैं।
उभरते ख़तरे: 2026 में, जैनेरेटिव एआई के जटिल हमलों पर, बहुत चिन्ताएँ उभरी हैं, जबकि quantum computing, मौजूदा सुरक्षा कवच यानि Encryption को तोड़ने का ख़तरा उत्पन्न कर रही है।

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