सोशल मीडिया और बच्चों की उससे दूरी वाले डिज़ाइन अभी भी असुरक्षित हैं

ओएचसीएचआर के अनुसार, डिजिटल जगत में तेज़ी से बदलाव आ रहे हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य टैक्नॉलॉजी तेज़ी से उभर रही हैं और इस वजह से स्फूर्त, तथ्य-आधारित नीतिनिर्माण आवश्यक हो गया है।


डिजिटल जगत में बच्चे, निजी तौर पर अनेक दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं। उन्हें ऑनलाइन बने रहने की लत लग रही है, उनकी निजता का हनन हो रहा है। यह कहना है मानवाधिकार मामलों के प्रमुख वोल्कर टर्क का। आगे वह कि ऐसा नहीं है कि इस स्थिति को टाला न जा सके, लेकिन यह कम्पनियों द्वारा कमर्शियल हितों के लिए सोच-समझकर उठाए गए क़दमों का नतीजा हैं।

बच्चों को सृजनशीलता से जोड़ने के साथ सीखने-सिखाने वाली डिजिटल दुनिया के कुछ जोखिम भी हैं। यह उनकी सुरक्षा और निजता के साथ कल्याण को प्रभावित करता है। डिजिटल दुनिया को बच्चों के लिए कल्याणकारी बनाने की खातिर यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ने देशों की सरकारों और टैक्नॉलॉजी कम्पनियों से ऑनलाइन माध्यमों के डिज़ाइन को बेहतर बनाने के लिए लिए ठोस क़दम उठाने का आग्रह किया है।

बच्चों के लिए सोशल मीडिया माध्यमों पर पाबन्दी के मामले में ओएचसीएचआर उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने एक 10-सूत्री फ़्रेमवर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह इन प्लैटफ़ॉर्म को सुरक्षित बनाने का स्थान नहीं ले सकता है।

जिस तरह से ऑनलाइन प्लैटफ़ॉर्म को डिज़ाइन किया जाता है, वह बच्चों को लगातार स्क्रॉल करने, ऑटोप्ले पर वीडियो देखने और लगातार सन्देश ऐलर्ट पाने के लिए बांधे रखता है।

मानवाधिकार कार्यालय द्वारा बच्चों के लिए ऑनलाइन सुरक्षा पर यह मार्गदर्शिका एक ऐसे समय में जारी की गई है जब सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म पर आयु-आधारित पाबन्दियाँ विश्व के अनेक हिस्सों में अपनाई जा रही हैं।

ऑस्ट्रेलिया ने दिसम्बर 2025 में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पाबन्दी लगा दी थी, जिसके बाद इंडोनेशिया और मलेशिया में भी इसे अपनाया गया। इसके बाद 12 से अधिक देश इसी तरह के क़दमों पर विचार कर रहे हैं।

उच्चायुक्त टर्क ने सचेत किया कि इस तरह की पाबन्दियों को बेअसर बनाने का रास्ता आसानी से निकाला जा सकता है। इस वजह से, बच्चों के ऐसी दिशा में आगे बढ़ने का जोखिम पैदा होता है, जहाँ कोई निगरानी व्यवस्था ही न हो।

“प्लैटफ़ॉर्म तक पहुँच को ही सीमित कर देना, जिससे वह असुरक्षित बना रहे, यह कोई अन्तिम बिन्दु नहीं हो सकता है।” ओएचसीएचआर में विशेष प्रक्रियाओं के लिए निदेशक पैगी हिक्स ने जिनीवा में बताया कि टैक कम्पनियों को अब एक स्पष्ट चयन करना है। उनके अनुसार, प्लैटफ़ॉर्म को जिस तरह से डिज़ाइन व संचालित किया जाता है, उसमें बदलाव कीजिए, बेहतर ढंग से बच्चों के अधिकारों व सुरक्षा के लिए। आगे वह कहती हैं कि या फिर आपको सख़्त क़ानूनों और नियामन सम्बन्धी जुर्माने के तहत ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

इन दिशानिर्देशों में प्लैटफ़ॉर्म के ताने-बाने को बुनते समय ही सुरक्षा उपायों पर ध्यान देने की बात कही गई है, बजाय इसके कि जोखिमों से निपटने की ज़िम्मेदारी अभिभावकों और बच्चों पर छोड़ी जाए। इसके साथ-साथ, बाल अधिकारों पर होने वाले असर की समीक्षा करने, आयु सत्यापन प्रक्रिया को सख़्ती से लागू करने, और बच्चों के साथ भी विचार-विमर्श करने की सिफ़ारिश की गई है, जिसे नियामन प्रक्रिया के दौरान अपनाया जाना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *