प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत दूसरा रेंज-वाइड डॉल्फिन सर्वे

सरकार ने उत्तर प्रदेश के बिजनौर से देश में नदी और समुद्री डॉल्फिन का दूसरा रेंज-वाइड असेसमेंट शुरू किया। यहइस पहल के साथ भारत के नदी पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए साक्ष्य-आधारित संरक्षण योजना और नीतिगत कार्रवाई का समर्थन करने हेतु ठोस वैज्ञानिक डेटा प्राप्त किया जाएगा।

प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत दूसरा रेंज-वाइड डॉल्फिन सर्वे

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का कहना है कि कि प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत सर्वे दो फेज में किया जाएगा। पहले फेज में सर्वे बिजनौर से गंगासागर और सिंधु नदी तक गंगा के मुख्य हिस्से को कवर करेगा, जबकि दूसरे फेज में, सर्वे ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों गंगा, सुंदरबन और ओडिशा को कवर करेगा।

मंत्रालय ने आगे कहा कि सर्वे में सिंधु नदी डॉल्फिन और इरावदी डॉल्फिन की स्थिति के साथ-साथ उनके रहने की जगह की स्थिति, खतरों और संबंधित संरक्षण प्राथमिकता वाले जीवों की स्थिति का भी असेसमेंट किया जाएगा। यह सर्वे प्रजातियों की आबादी के अनुमान को अपडेट करने और प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत बेहतर संरक्षण प्लानिंग में मदद करेगा।

सर्वेक्षण की शुरुआत तीन नौकाओं में सवार 26 अनुसंधानकर्ताओं ने की। उन्होंने पारिस्थितिकीय और पर्यावास मापदंडों को रिकॉर्ड किया तथा पानी के नीचे ध्वनिक निगरानी के लिए हाइड्रोफोन जैसी तकनीकों का उपयोग किया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, गंगा नदी डॉल्फिन के अलावा, सर्वेक्षण में सिंधु नदी डॉल्फिन और इरावदी डॉल्फिन की स्थिति का आकलन किया जाएगा, साथ ही उनके आवास की स्थिति, खतरों और उनसे संबंधित संरक्षण-प्राथमिकता वाले जीवों का भी आकलन किया जाएगा।

बताते चलें कि पिछला राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण 2021-23 में हुआ था। देश में अनुमानित तौर पर नदी डॉल्फ़िन की संख्या 6,327 दर्ज की गई थी, जिनमें गंगा, यमुना, चंबल, गंडक, घाघरा, कोसी, महानंदा और ब्रह्मपुत्र प्रणालियों में पाई जाने वाली गंगा नदी डॉल्फ़िन और ब्यास नदी में पाई जाने वाली सिंधु नदी डॉल्फ़िन की एक छोटी आबादी शामिल है।

सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश और बिहार में दर्ज की गई थी। इसके बाद पश्चिम बंगाल और असम का स्थान रहा, जो डॉल्फिन के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए गंगा बेसिन के महत्वपूर्ण महत्व को उजागर करता है। इस विस्तारित भौगोलिक कवरेज के ज़रिए प्रजाति के गणना संबंधी अनुमानों को अद्यतन करने, खतरों और आवास की स्थितियों का आकलन करने और प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत बेहतर संरक्षण योजना बनाने में सहायक होगी।

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