शेखर कपूर इस समय “मासूम – द नेक्स्ट जेनरेशन” की तैयारी कर रहे हैं। यह जानकारी देते हुए उन्होंने अपनी पहली फिल्म “मासूम” की सादगी को याद किया और इसे अपने करियर के सबसे सुखद दौर में से एक बताया है।

फिल्म निर्माता ने पुरानी दिनों को एक बार फिर से याद करते हुए इंस्टाग्राम पर अपनी एक पुरानी तस्वीर शेयर की है। तस्वीर के साथ उन्होंने एक लंबी पोस्ट लिखी है। उस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जब वह यह फिल्म बना रहे थे उन दिनों इसके पीछे की कैसी-कैसी भावनाएं थी।
शिकार कपूर सवाल करते हैं कि क्या यह सच है कि सादगी, आनंद, ईमानदारी और कहानी कहने जैसे शब्द मुंबई की फिल्मों से गायब हो गए हैं? क्या फंडिंग की नई व्यवस्था ने एक ऐसी व्यवस्था बना दी है, जो रचनात्मकता के विरुद्ध है… एक ऐसी व्यवस्था जो एमबीए और मैनेजमेंट वाले लोगों के इंटरफेयर की है…?… उन लोगों द्वारा जो यह भूल जाते हैं कि सच्ची रचनात्मकता इंटरनली आती है। व्यक्तित्व की भावना से… विनम्रता के बड़े अंशों के साथ…आती है।
अपनी पोस्ट के अंत में उन्होंने लिखा “अच्छा… मुझे पता चलने वाला है, ना? उम्मीद है कि मासूम – द नेक्स जनेरेशन, उसी खुशी के भाव के साथ बनाई जाएगी जो आप ऊपर की तस्वीर में देख रहे हैं…”
गौरतलब है कि फिल्म निर्माता शेखर कपूर ने अपने करियर की शुरुआत 1983 में शबाना आज़मी और नसीरुद्दीन शाह अभिनीत फिल्म मासूम से की थी। यह एक क्लासिक फिल्म बन गई। शेखर कपूर ने मासूम के निर्देशन को खूबसूरत और खुशनुमा दिन बताया और कहा कि उस फिल्म को बनाना वाकई सबके लिए एक खुशी की बात थी।
शेखर ने आगे कहा कि यही कारण है कि आज इतने सालों बाद, वह कहीं भी मासूम के बारे में बात किए नहीं रह सकते। वह मानते हैं कि आज ज़्यादातर लोग इतने छोटे हैं कि जब फिल्म रिलीज़ हुई थी तब उनका जन्म भी नहीं हुआ था। उन्होंने इसे टीवी,यूट्यूब,वगैरह पर देखा है। इस फिल्म के लगाव का ज़िक्र करने के साथ फिल्म निर्माता ने अपनी कुछ चिंताएं व्यक्त करते हुए नई फिल्म का ऐलान किया।
शेखर कपूर ने कहा कि अब जब मैं मासूम को अगली पीढ़ी के लिए बनाने जा रहा हूं, तो मैं सचमुच फिल्म निर्माण के उस आनंद को फिर से पाना चाहता हूं। साथ ही उन्होने चिंता जताई है अभी वह मुंबई की एक लंबी यात्रा से लौटे हैं और अब उनके सभी फिल्म निर्माता दोस्त फिल्म बनाने को एक ‘कार्य’ के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह आनंद की चीज़ के रूप में नहीं। उनका कहना है कि ज़्यादातर लोग फंडिंग स्रोतों से ‘हस्तक्षेप’ की बात करते हैं और यह सब उन्हें हैरान करता है।
उन्होंने आगे कहा, “मासूम मेरी पहली फिल्म थी। मैंने किसी को असिस्ट नहीं किया था, न ही फिल्म निर्माण पर कोई किताब पढ़ी थी… मैं बस एक कहानी कहना चाहता था, और इसे जितना हो सके उतना अच्छा और सरल तरीके से बताना चाहता था… और जितना हो सके ईमानदारी से बताना चाहता था…”
