बढ़ने लगी है विलुप्ति की कगार पर पहुंचे बाघों की दुर्लभ झलक

यूएनडीपी के सहयोग से शुरू की गई पहल ने बाघों के संरक्षण और उनके आवासों के पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण प्रगति सुनिश्चित की है। एशिया-प्रशान्त के बाघ आवासीय देशों में जिन क्षेत्रों में कभी बाघ विलुप्ति की कगार पर थे, वहाँ अब उनकी दुर्लभ झलक फिर से दिखने लगी है।

बढ़ने लगी है विलुप्ति की कगार पर पहुंचे बाघों की दुर्लभ झलक

भूटान, भारत और नेपाल जैसे देशों में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है। यह सफलता मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति, संरक्षित क्षेत्रों के मज़बूत नैटवर्क और शिकार रोकने के लिए उठाए गए सख़्त क़दमों के कारण सम्भव हुई है।

एक समय था जब दुनियाभर के प्राकृतिक आवासों में लगभग एक लाख जंगली बाघ पाए जाते थे। लेकिन 2010 तक इनकी संख्या घटकर सिर्फ़ 3,200 रह गई और वह भी अपने पुराने क्षेत्रों के महज़ 8% हिस्से तक ही सीमित रह गए। आज 10 देशों में बाघों की ऐसी आबादी मौजूद है जो प्रजनन में सक्षम है। जहाँ उन्हें खुला इलाक़ा, पर्याप्त शिकार और एक स्वस्थ पर्यावरण मिलता है।

सरकारों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP), वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) ने भारत सहित नेपाल, भूटान, मलेशिया और अन्य देशों में इन प्रयासों को लगातार आगे बढ़ा रहा है।

बाघ केवल एक प्रजाति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत, सह-अस्तित्व और प्रकृति की शक्ति का प्रतीक है। एक प्रमुख प्रजाति के रूप में, बाघ एक स्वस्थ पर्यावरण की निशानी हैं। उनकी मौजूदगी जैव विविधता की वापसी और पारिस्थितिकी सेवाओं के पुनरुद्धार को दर्शाती है, जिसका लाभ सीधे स्थानीय समुदायों को मिलता है।

पहली बार 2022 में बाघों की घटती संख्या स्थिर हुई और उनकी वैश्विक आबादी बढ़कर 4 हज़ार 485 हो गई। हालाँकि यह बढ़त सभी देशों में समान नहीं रही। जंगलों का बिखराव, मानव-वन्यजीव संघर्ष, सीमित संसाधन और क़ानूनों को ठीक से लागू करने में कठिनाई, अब भी बड़ी चुनौतियाँ हैं।

कई देशों को वित्त की भारी कमी है, और उनके पास बाघों के गलियारों के नुक़सान व बुनियादी ढाँचे के विस्तार जैसे नए ख़तरों से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

यूएनडीपी इन समस्याओं के समाधान के लिए ज़मीनी स्तर पर काम कर रहा है और सरकारों व साझीदारों के साथ मिलकर बाघ संरक्षण के लिए नए वित्तीय स्रोत तैयार कर रहा है।

साथ ही, “विलुप्तप्राय प्रजातियों की अवैध और अस्थिर तस्करी के विरुद्ध” परियोजना के तहत नीति निर्माण, प्रवर्तन क्षमता और समुदाय की भागेदारी को भी सशक्त बनाया गया।

जहाँ एक ओर बाघों की सुन्दरता, ताक़त और रहस्य की सराहना की जाती है वहीँ जिन किसानों और ग्रामीणों को उनके साथ ज़मीन साझा करनी पड़ती है, उनके लिए बाघ एक वास्तविक और गम्भीर ख़तर हैं। इंडोनेशिया के सुमात्रा क्षेत्र में यह मानव-वन्यजीव संघर्ष रोज़मर्रा की सच्चाई है। ख़ासतौर पर वहाँ, जहाँ वनों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव ने बाघों का प्राकृतिक आवास नष्ट कर दिया है।

इसी चुनौती से निपटने के लिए यूएनडीपी ज़मीनी स्तर पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है। वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) द्वारा वित्तपोषित और यूएनडीपी द्वारा समर्थित सुमात्रा टाइगर परियोजना के तहत, स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि इनसानों और बाघों, दोनों की सुरक्षा बनी रहे।

परियोजना के तहत बाघ-प्रतिरोधी बाड़ों का निर्माण, संघर्ष प्रबंधन के लिए ग्रामीणों को प्रशिक्षण, और समुदाय की भागेदारी के कई अन्य उपाय अपनाए जा रहे हैं, ताकि सह-अस्तित्व सम्भव हो सके।

बढ़ती बाघ आबादी को सुरक्षित रखने के लिए ज़रूरी है कि वे फिर से उन इलाक़ों में लौट सकें जहाँ से वे ग़ायब हो चुके हैं और इसके लिए जंगलों का आपस में जुड़ा होना बेहद ज़रूरी है।

दक्षिण-पूर्व एशिया में वनों की तेज़ कटाई ने बाघों के आवास को, टुकड़ों में बाँट दिया है. बचे-खुचे जंगलों को जोड़ना और आसपास के बिगड़े हुए क्षेत्रों को बहाल करना, बाघों के भविष्य के लिए अहम है।

जुड़े हुए जंगल बाघों को नए इलाक़ों में जाने, शिकार ढूँढने और प्रजनन के बेहतर अवसर देते हैं, जिससे उनके जीवित रहने की सम्भावना बढ़ती है।

बाघों के बचे आवास क्षेत्रों की रक्षा और ज़रूरी संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए बाघ परिदृश्य निवेश कोष (TLIF) की स्थापना की गई है। इसका उद्देश्य निजी निवेश को ऐसे व्यवसायों की ओर मोड़ना है जो बाघ आवासों के संरक्षण, पुनर्स्थापना और सतत प्रबंधन में सहयोग करें।
यूएनडीपी के सहयोग से शुरू की गई पहल ने, बाघों के संरक्षण और उनके आवासों के पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण प्रगति सुनिश्चित की है। एशिया-प्रशान्त के बाघ आवासीय देशों में जिन क्षेत्रों में कभी बाघ विलुप्ति की कगार पर थे, वहाँ अब उनकी दुर्लभ झलक फिर से दिखने लगी है।

भूटान, भारत और नेपाल जैसे देशों में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है। यह सफलता मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति, संरक्षित क्षेत्रों के मज़बूत नैटवर्क और शिकार रोकने के लिए उठाए गए सख़्त क़दमों के कारण सम्भव हुई है।

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