आवारा कुत्तों के मामले की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अगर पालतू कुत्ता पड़ोसी पर हमला करता है तो यह अपराध है। अदालत ने एनिमल बर्थ कंट्रोल यानी एबीसी के कमजोर अमल पर नाराजगी जताते हुए ग्राम पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

गुरूवार को आवारा कुत्तों के मामले की सुनवाई में अदातल ने सीनियर एडवोकेटस सी यू सिंह, कृष्णन वेणुगोपाल, ध्रुव मेहता, गोपाल संकरनारायणन, श्याम दिखान, सिद्धचे लूथरा और करुणा नंदी सहित कई वकीलों की दलीलें सुनीं। अदालत ने किसी पालतू कुत्ते द्वारा अनजाने में होने वाली इस घटना को अपराध की श्रेणी में रखा है। इस मामले की सुनवाई आज यानी शुक्रवार को भी जारी रहेगी।
मामले की सुनवाई की शुरूआत में एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल ने पीठ को जानकारी दी कि बुधवार को चार राज्यों ने इस मामले में अपने अनुपालन हलफनाने दाखिल किए है। आगे उन्होंने बताया कि दिल्ली जैसे शहरों में चूहों का गंभीर प्रकोप है और राष्ट्रीय राजधानी में बंदरों की भी एक बड़ी समस्या है।
इस बीच अदालत में आईआईटी दिल्ली में लागू एबीसी मॉडल का हवाला दिया गया, जहां युद्धस्तर पर स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन के बाद पिछले तीन वर्षों में रेबीज का कोई मामला सामने नहीं आया। कोर्ट को बताया गया कि माइक्रो-चिपिंग और जियो टैगिंग से कुत्तों की निगरानी आसान हो गई है।
सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि कुत्तों को अचानक हटाने से चूहों की आबादी बढ़ेगी, जिसके दुष्परिणाम होंगे। इस पर जस्टिस मेहता ने सवालिया टिप्पणी में कहा कि कुत्ते और बिल्लियां दुश्मन है। बिल्लियां चूहों को मारती हैं। इसलिए हमें और बिल्लियों को बढ़ावा देना चाहिए?
आवश्यक संशोधन करने का अनुरोध करते हुए एडवोकेट सिंह ने कहा कि वे कोर्ट के आदेशों पर पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। साथ ही उन्होंने कुत्तों की संख्या स्टरलाइजेशन वैक्सीनेशन और फिर उसी इलाके में छोड़ने के तरीके से नियंत्रित किए जाने की बात कही।
सुनवाई के दौरान बेंच ने यह सवाल भी उठाया कि प्रत्येक अस्पताल में कितने कुत्तों को गलियारों में, वॉर्डों में और मरीजों के बेड्स के पास घूमने की अनुमति होनी चाहिए?











