भारत के गुमनाम साहित्यकारों को तलाशते अमरीकी प्रोफेसर विलियम पिंच

विलियम पिंच एक अमरीकी इतिहासकार है और उनकी दिलचस्पी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलनों से जुड़े साहित्यकारों में इतनी ज़्यादा है कि वह इस विषय पर शोध कर रहे हैं। पिंच कहते हैं कि उनका उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन और किसान आंदोलन से जुड़े साहित्यकारों की भूमिका को समझना है।

भारत के गुमनाम साहित्यकारों को तलाशते अमरीकी प्रोफेसर विलियम पिंच

ई टीवी भारत डॉट कॉम की एक खबर के मुताबिक़, बिहार की धरती से जन्में साहित्यकारों और किसान आंदोलन को जानने के लिए विलियम पिंच बिहार और उत्तर प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। विलियम पिंच अमरीका के वेस्लेयन यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर हैं। जिनका मानना है कि यहां के साहित्यकार बल्कि ऐसे गुमनाम इतिहासकारों का योगदान इतिहास के कोने में दब गया है।

खबर के मुताबिक़, उनका बिहार से जुड़ाव नया नहीं है। वह इससे पहले भी बिहार के किसान आंदोलन पर शोध कर चुके हैं। शोध इतना प्रभावी रहा कि अमरीका के यूनिवर्सिटी में किसान आंदोलन को सिलेबस में जोड़ा गया।

पिंच का मानना है कि ये लोग सिर्फ लेखक ही नहीं बल्कि समाज और इतिहास को दिशा देने वाले पात्र हैं। ऐसे में साहित्यकार और किसान नेताओं से बातचीत कर इतिहास को समझने की कोशिश में विलियम पिंच इन दिनों बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों का दौरा कर रहे हैं।

अमरीकी साहित्यकार पिंच अपने शोध के दौरान बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, मोतिहारी, सिकटा, लौरिया, केसरिया आदि का भ्रमण कर चुके हैं। इन इलाकों में इतिहास, दस्तावेज और साहित्य को जाना है।

विलियम पिंच का बचपन भारत और पाकिस्तान में बीता है। वे बताते हैं कि इनके पिता अमरीकी एंबेसी में डिप्लोमेट थे। इस दौरान वे कराची में भी काम किया था। इस कारण पिंच का बचपन दिल्ली, लखनऊ और कराची जैसे शहरों में बीता। यही कारण है कि पिंच को भारतीय समाज और संस्कृति को समझने में दिलचस्पी है।

दक्षिण एशियाई इतिहास के विशेषज्ञ पिंच ने अब तक तीन किताबें लिखी हैं, जिसमें भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास का जिक्र किया है। पहली किताब ‘Warrior Ascetics and Indian Empires’ है, जिसमें भारत में 16-19वीं सदी के साधु-संतो और सैन्य शक्ति का जिक्र किया है।

पिंच की दूसरी किताब ‘Peasants and Monks in British India’ इसमें औपनिवेशिक भारत को समझाया है, जबकि तीसरी किताब ‘Contesting the Nation’ में औपनिवेशिक भारत के जाति, धर्म और राष्ट्रवाद को केंद्रित किया है।

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