जातिगत गणना का विपक्ष ने किया समर्थन मगर कब और कैसे किए जाने का उठाया सवाल

केंद्र सरकार ने कास्ट सेंसस के साथ अगली जनगणना कराने का फैसला किया है। कैबिनेट की बैठक में लिए गए फैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि मोदी सरकार अगली जनगणना के साथ जातीय आधार पर लोगों की गणना भी करेगी।

जातिगत गणना का विपक्ष ने किया समर्थन मगर कब और कैसे किए जाने का उठाया सवाल

केंद्र सरकार ने 30 अप्रैल 2025 को जनगणना कराने की हामी भरी है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यह भी दावा किया है कि जातीय जनगणना से सामाजिक ढांचे को कोई नुकसान नहीं होगा।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पिछले लंबे समय से देश में जाति जनगणना कराने की मांग उठाते आ रहे हैं। माना जा रहा है कि मोदी सरकार ने बिहार चुनाव से पहले आगामी जनगणना में जातिगत गणना को भी शामिल करने का फैसला किया है।

राहुल गांधी ने अगली जनगणना में जातिगत गणना कराए जाने के केंद्र सरकार के फैसले का स्वागत किया है। राहुल ने सवाल किया है कि सरकार को बताना चाहिए कि यह किस तिथि तक होगी और कैसे कराई जाएगी।

मोदी सरकार ने बुधवार को कैबिनेट बैठक में फैसला किया कि आगामी जनगणना में जातिगत गणना को ‘पारदर्शी’ तरीके से शामिल किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से वर्तमान में आरक्षण पर 50 फीसदी का कैप लगा हुआ है। जाति जनगणनाकी मांग पिछले कई वर्षों से की जा रही है। माना जा रहा है कि जाति गणना के आंकड़े आने के भारत में बहुत कुछ बदल जाएगा। इसमें सबसे बड़ा बदलाव आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा को बढ़ाया जाना माना जा रहा है।

कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने साल 2011 में पूरे देश में कास्ट सेंसस के लिए कदम उठाया था। उस समय सोशियो इकनॉमिक कास्ट सेंसस (SECC) कराया गया, मगर इसके आंकड़े सामने नहीं आए थे।

इसके साथ ही कर्नाटक, बिहार और तेलंगाना में जातिगत सर्वे के बाद अब राष्ट्रीय स्तर पर जातिवार जनगणना का रास्ता साफ हो गया है।

संविधान के अनुच्छेद 246 के अनुसार, जनगणना की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की है। हालांकि कर्नाटक, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाए। संवैधानिक रूप से ये राज्य जातिगत जनगणना नहीं करा सकते थे, इसलिए इसे इसे कास्ट सर्वे का नाम दिया गया।

भारत में पहली जनगड़ना अंग्रेजों द्वारा 1901 में कराई गई। जबकि कास्ट सेंसस 1931 में कराया गया। इसके लिए अंग्रेजों ने साल 1853 में नॉर्थ वेस्टर्न प्रॉविंसेज में जातिवार गणना के बारे में विचार किया। उस समय के सेंसस एडमिनिस्ट्रेटर एच एच रिजले की अगुवाई में यह तय हुआ कि किसे किस जाति का माना जाए। तब अंग्रेज़ों ने वर्गीकरण करते हुए वर्ण व्यवस्था और पेशे के आधार पर अलग-अलग जाति समूह बनाए और इनमे विभिन्न जातियों को सम्मिलित किया।

1901 की जनगणना से प्राप्त आंकड़ों से मालूम हुआ कि भारत में 1646 जातियां हैं। इसके बाद 1931 की जनगणना से पता चला कि देश में जातियों की संख्या बढ़कर 4147 हो गई। साथ ही यह जानकारी भी सामने आई कि अकेले ओबीसी में हजारों जातियां हैं।

इसी क्रम में 1951 से 2011 तक हुई प्रत्येक जनगणना में एससी और एसटी की आबादी भी दर्ज की गई, मगर इस बार भी किसी अन्य जाति समूह के लोगों की गणना नहीं कराई गई।

मंडल आयोग ने वर्ष 1980 में बताया था कि देश में 3428 जातियों की पहचान ओबीसी के रूप में गई है।

साल 2011 में यूपीए सरकार ने सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) कराई, यह आजाद भारत में राष्ट्रीय स्तर उठाया गया पहला क़दम था।

जून 2014 में मोदी सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी कि सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना का काम पूरा होने में और 3 महीने लगेंगे। हालांकि ये आंकड़े कभी जारी नहीं हो सके।

2018 में सरकार ने सरकार ने ‘कास्ट डेटा की प्रोसेसिंग में कुछ गलतियों की जानकारी लोकसभा में दी।

वर्ष 2021 में केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामें के ज़रिए बताया कि एससी, एसटी के सिवा बाकी लोगों के बीच कास्ट सेंसस ‘कराना प्रशासनिक रूप से बेहद मुश्किल और जटिल है।’

केंद्र सरकार की ओर से जाति गणना को मंजूरी दिए जाने के बाद माना जा रहा है कि गणना के आंकड़े आने पर देश में बड़े पैमाने पर बदलाव आएगा। इस जानकारी से सामाजिक और आर्थिक रूप से अहम जानकारी सामने आएगी। सरकार को भी कल्याणकारी नीतियों का फायदा वंचित वर्गों तक सटीक तरीके से पहुंचाने में आसानी होगी।

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