इस 24 फरवरी को रूस-यूक्रेन युद्ध को शुरू हुए पूरे हो गए। यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने इस ऐतिहासिक और दर्दनाक मौके पर एक भावुक लेकिन मज़बूत सन्देश जारी किया।

अपने सन्देश में ज़ेलेंस्की ने गर्व से कहा, “पुतिन अपने किसी भी लक्ष्य को पाने में नाकाम रहे हैं। वह यूक्रेन की हिम्मत तोड़ने में नाकाम रहे हैं, न ही वह यह युद्ध जीत पाए हैं। हमने अपने देश को बचा लिया है, और अब हम शांति और न्याय के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे।”
जेलेंस्की स्वीकार करते हैं कि लगातार युद्ध से आम लोग और सैनिक थक चुके हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि देश के अस्तित्व की है। आगे उन्होंने यह भी कहा, ‘अगर हम उसे सब कुछ दे दें जो वह चाहता है, तो हम सब कुछ खो देंगे। लोग या तो भागने को मजबूर होंगे या रूसी बन जाएंगे।’
अपने सन्देश में वह आगे बताते हैं कि इस युद्ध की नींव 1991 में सोवियत संघ के टूटने के साथ ही पड़ गई थी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का मानना है कि यूक्रेन का अमरीका और यूरोपीय देशों (NATO) की तरफ झुकाव रूस की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। पुतिन को डर है कि अगर यूक्रेन नाटो में शामिल होता है, तो रूस की सीमाओं पर पश्चिमी मिसाइलें तैनात हो जाएंगी। यह झगड़ा तब और गहरा गया जब 2014 में रूस के सपोर्टर प्रेसिडेंट विक्टर यानुकोविच को सत्ता से हटा दिया गया और रूस ने क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया। इससे पूर्वी यूक्रेन के डोनबास इलाके में झगड़ा शुरू हो गया, जो 2012 में बड़े पैमाने पर युद्ध में बदल गया।
चार साल के युद्ध में पहली बार, ठोस शांति बातचीत शुरू हुई है। यूएस प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने झगड़े को खत्म करने के लिए 28-पॉइंट डील का प्रस्ताव रखा है। यह राहत की बात है कि यूएस की मध्यस्थता में रूस और यूक्रेन दोनों इस प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए टेबल पर आए हैं।
बताते चलें कि रूस-यूक्रेन युद्ध के चार साल पूरे होने से ठीक पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने कहा था कि देश थक चुका है, लेकिन झुकेगा नहीं। उन्होंने कहा कि अगर यूक्रेन ने रूस की शर्तें मान लीं तो इसका मतलब होगा कि देश अपनी संप्रभुता खो देगा।
जेलेंस्की ने सीएनएन को दिए इंटरव्यू में स्वीकार कि लगातार युद्ध से आम लोग और सैनिक दोनों थक चुके हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि देश के अस्तित्व की है। आगे उन्होंने यह भी कहा, ‘अगर हम उसे सब कुछ दे दें जो वह चाहता है, तो हम सब कुछ खो देंगे। लोग या तो भागने को मजबूर होंगे या रूसी बन जाएंगे।’













