ब्राज़ील के बेलेम शहर में यूएन वार्षिक जलवायु शिखर सम्मेलन COP30 संपन्न हो गया। यहाँ दुनिया भर के देशों के प्रतिनिधियों के बीच जारी बातचीत के दौरान बुलन्दी के साथ जो सन्देश सामने आया, वह कहता है– लैंगिक समानता के बिना कोई जलवायु न्याय नहीं हो सकता।

बेलेम लैंगिक कार्रवाई योजना इस बातचीत का केंद्र रही। इसमें कहा गया कि जलवायु परिवर्तन महिलाओं पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है और वित्त, प्रशिक्षण, व नेतृत्व भूमिकाओं के लिए उपाय निर्धारित करता है। ब्राज़ील में यूएन वुमन की कार्यकारी प्रतिनिधि ऐना कैरोलीना कुएरिनो कहती हैं, “जलवायु न्याय तभी होता है जब लैंगिक समानता भी होती है।”
अगर इस ब्लूप्रिंट को अपनाया जाता है, तो यह योजना 2026 से 2034 तक चलेगी, जिसमें लैंगिक समानता से सम्बन्धित मुद्दों को, सही बदलावों, अनुकूलन, और जलवायु के प्रभावों को कम करने की रणनीति व नुक़सान और क्षति के लिए प्रणालियाँ विकसित करने में शामिल किया जाएगा।
अनूकूलन (Adaptation) व शमन (Mitigation) को यह मानना होगा कि जलवायु आपदाएँ, महिलाओं को सबसे ज़्यादा प्रभावित करती हैं, जिससे लैंगिक आधार पर हिंसा, विस्थापन और सम्बन्धियों की देखभाल करने के बोझ का ख़तरा बढ़ जाता है।
ब्राज़ील में अधिकतर कचरा बीनने वालों और अधिकत सहकारी संगठनों की मुखिया महिलाएँ हैं। फिर भी उन्हें सड़कों पर नस्लभेद और लैंगिक पूर्वाग्रहों पर आधारित हिंसा का सामना करना पड़ता है। जबकि वो इस काम के साथ-साथ, अक्सर अपने घरों और परिवारों की देखभाल भी करती हैं।
एक ऐसी ही कचरा बीनने वाली महिला नैंसी की नज़र में, जलवायु परिवर्तन उनके काम को और मुश्किल बना रहा है। बढ़ती गर्मी और बाढ़, कम आय वाली बस्तियों सबसे अधिक ज़्यादा प्रभावित कर रही हैं, जिससे पहले से ही मुश्किल हालात और भी मुश्किल हो गए हैं।
वह चाहती हैं कि COP30 का अनुकूलन एजेंडा, कचरा बीनने वालों को “रूपान्तर के एजेंट” के तौर पर पहचान दे, जिनके पास बेहतर नगरीय सुविधाएँ, पानी पीने के लिए बेहतर सुविधा केन्द्र और निश्चित रक़म सुनिश्चित करने वाले रोज़गार दस्तावेज़ हों।
24 साल की पुर्तगाली वकील मारियाना गोम्स क़ानून का इस्तेमाल अटलांटिक पार से जलवायु संकट से लड़ने के लिए “सबसे ज़रूरी उपकरण” के तौर पर कर रही हैं।उन्होंने अल्टिमो रिकर्सो नामक संगठन की स्थापना की, जिसने पुर्तगाल का पहला जलवायु याचिका मुक़दमा दायर किया था। यह संगठन अब 170 से अधिक मुक़दमे चला रहा है।
मारियाना गोम्स का मानना है कि मुक़दमेबाज़ी वादों को ज़रूरी कार्रवाई में बदल सकती है, ख़ासतौर पर अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की हालिया राय के बाद, जिसमें देशों को, वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5° सेल्सियससे नीचे रखने के लिए काम करने की ज़रूरत बताई गई है।
मारियाना बताती हैं, “मेरा मानना है कि भविष्य में हम देशों के ख़िलाफ़ बहुत से मुक़दमे देखेंगे, ख़ासतौर पर उनके ख़िलाफ़ जिन्हें अपनी महत्वाकांक्षा बढ़ानी होगी, जलवायु क़ानून अपनाने होंगे और अपने लक्ष्यों को पेरिस समझौते के साथ जोड़ना होगा. क्योंकि अब हम, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय का बोझ, पहले से कहीं अधिक, अपनी पीठ पर उठा रहे हैं।”
इन लोगों का कहना है कि अनूकूलन (Adaptation) व शमन (Mitigation) को यह मानना होगा कि जलवायु आपदाएँ, महिलाओं को सबसे ज़्यादा प्रभावित करती हैं, जिससे लैंगिक आधार पर हिंसा, विस्थापन और सम्बन्धियों की देखभाल करने के बोझ का ख़तरा बढ़ जाता है।
इनके अनुसार, क़ानूनी कार्रवाई, कार्बन उत्सर्जन कम करने या खनन परियोजनाओं को रोकने से कहीं अधिक लाभ पहुँचा सकती है। इससे प्रभावित समुदायों के लिए धन और मुआवज़ा मिल सकता है, और साथ ही महिलाओं के अधिकारों की भी रक्षा हो सकती है।
