आरएसएसी यानी रिमोट सेंसिंग एप्लिकेशन सेंटर के वैज्ञानिकों की ओर से किए गए पोस्ट-मानसून सर्वे से पता चला है कि लखनऊ की हवा बेहद खराब हो चुकी है और केवल छह एक्यूआई सेंटरों से इसे मापना काफी नहीं है।

रिपोर्ट में शोध के हवाले से सुझाव दिया गया है कि शहर के अधिक से अधिक इलाकों में नए एक्यूआई मॉनिटरिंग सेंटर लगाए जाएं। इसके लिए केवल छह वायु गुणवत्ता मापक केंद्र नाकाफी हैं।
पोर्टेबल एक्यूआई डिटेक्टर के आंकड़े इसकी जो तस्वीर पेश कर रहे हैं वह बेहद डरावनी है। रिपोर्ट बताती है कि पोस्ट-मानसून और दीवाली के बाद कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक 400 से ऊपर पहुंच गया। यह स्तर स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक माना जाता है।
पड़ताल से पता चला कि लगभग 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले लखनऊ में 40 लाख से ज्यादा आबादी निवास करती है। यहाँ उद्योगों के साथ ही सड़कों पर वाहनों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। ऐसे में अनियंत्रित निर्माण कार्यों की वजह से हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हुई है।
दिवाली के दिन और इसके अगले दिन होने वाली आतिशबाज़ी की वजह से राजधानी में शोर का स्तर 893 डेसिबल तक पहुंच गया। शोर का यह भयावह स्तर बुजुर्गो, दिल के मरीजों और पशु-पक्षियों के लिए बेहद घातक है।
21- 24 अक्तूबर के बीच पूरे शहर के 110 वार्डों और 8 जोनों में 282 स्थानों पर पोस्ट-मानसून हवा की गुणवत्ता की जांच की गई। इसमें जिओ-सपैशियल तकनीक के जरिए मानचित्रीकरण भी किया। इस काम के लिए वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुधाकर शुक्ला की अगुवाई में डॉ. राजीव, नीलेश, पल्लवी, ममता, वैभव, शाश्वत, सौरभ और सुजीत वैज्ञानिक टीम का हिस्सा बने।
सर्वे से पता चला है कि अब तक का सबसे साफ प्रदुषण रहित माना जाने वाला कैंट एरिया भी अब पहले जैसा नहीं रहा। इसके अलावा अलीगंज, अमीनाबाद, चौक और विकासनगर जैसे घनी आबादी वाले इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। औद्योगिक क्षेत्र तॉलकटोरा में भी प्रदूषण का स्तर भयावह रूप ले चुका है।
प्रदूषण घटाने के लिए कृत्रिम बारिश के विकल्प पर वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रदूषण घटाने के लिए ”सिल्वर आयोडाइड” रसायन से कृत्रिम बारिश बच्चों के लिए घातक साबित हो सकती है। इससे खतरनाक कंपाउंड के मिट्टी, पानी और वातावरण में स्थाई तौर पर जमा होने से त्वचा और श्वास संबंधी समस्याओं में इज़ाफ़ा हो सकता है।
राजधानी लखनऊ में हर दिन बढ़ती आबादी, वाहन और इन दिनों होने वाली आतिशबाज़ी ने शहर की फ़िज़ा के भारी नुकसान पहुंचाया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि नए एक्यूआई मॉनिटरिंग सेंटर स्थापित करने से हर वार्ड की असली वायु प्रदूषण की स्थिति की सटीक तस्वीर सामने आएगी। साथ ही आम लोगों को भी प्रदूषण रोकथाम के लिए सजग और साक्षर बनना होगा। इसके अलावा औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों के प्रदूषण की जांच, सही ट्रैफिक व्यवस्था भी ज़रूरी है। इन सबके साथ हरियाली को और बढ़ाना और आतिशबाज़ी को सीमित किया जाना भी ज़रूरी है।












