यूएन एजेंसियों का कहना है कि यदि विशालकाय सैन्य ख़र्च का केवल एक प्रतिशत धन भी खाद्य सुरक्षा पर ख़र्च किया जाए, तो किसी को जीवित रहने के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन के लिए तरसना नहीं पड़ेगा।

आज भी दुनिया भर में करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के अनुसार, वर्ष 2030 तक दुनिया से भूख समाप्ति के लिए सालाना सिर्फ़ 93 अरब डॉलर की ज़रूरत होगी। यह राशि पिछले दशक में हुए सैन्य ख़र्च लगभग 22 खरब डॉलर के एक प्रतिशत से भी कम है।
WFP की वैश्विक परिदृश्य (Global Outlook) 2026 रिपोर्ट आगाह करती है कि 2026 तक, लगभग 31 करोड़ 80 लाख लोग गम्भीर भूख या उससे भी बुरी स्थिति का सामना करेंगे. यह संख्या 2019 में दर्ज हुए आँकड़े से लगभग दोगुनी है।
संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशिका सिंडी मैक्केन ने कहा कि भोजन असुरक्षा से निपटने के लिए दीर्घकालिक समाधान में निवेश करने के उद्देश्य से साल 2026 में लगभग 13 अरब डॉलर की अनुमानित लागत के ज़रिए, 11 करोड़ कमज़ोर लोगों की मदद करने की योजना है।
संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम के मुताबिक़, विश्व के सबसे खाद्य असुरक्षित लोगों के लिए अन्तरराष्ट्रीय सहायता “धीमी, असंगठित और अपर्याप्त” है, जिससे दुनिया के संकटग्रस्त क्षेत्रों में रहने वाले बहुत से लोगों को, साल 2026 में पर्याप्त सहायता नहीं मिल पाएगी।
संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशिका सिंडी मैक्केन ने कहा कि यह खाद्य सहायता एजेंसी, युद्धग्रस्त क्षेत्रों और मौसमजनित आपदाओं से जूझ रहे लोगों और अपना घर छोड़ने को विवश हुए लोगों के लिए, एक बेहद महत्वपूर्ण जीवनरेखा प्रदान करती है।
उन्होंने कहा, “हम भोजन असुरक्षा से निपटने के लिए दीर्घकालिक समाधान में निवेश करने के उद्देश्य से अपने काम करने के तरीके़ भी बदल रहे हैं।” 2026 में, यह खाद्य एजेंसी, लगभग 13 अरब डॉलर की अनुमानित लागत के ज़रिए, 11 करोड़ कमज़ोर लोगों की मदद करने की योजना बना रही है।
इसमें आपातकालीन खाद्य सहायता, पोषण, सामुदायिक सशक्तिकरण कार्यक्रम और राष्ट्रीय प्रणालियों को मज़बूत करने के लिए तकनीकी सहायता शामिल होगी। कार्यकारी निदेशिका ने कहा कि “दुनिया इस समय ग़ाज़ा और सूडान के कुछ हिस्सों में एक साथ फैल रही अकाल जैसी स्थितियों से जूझ रही है। 21वीं सदी में ऐसी स्थिति बिल्कुल अस्वीकार्य है।”
इस बारे में संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव आमिना मोहम्मद का कहना है, “सबसे निर्धन लोगों को इसकी क़ीेमत चुकानी पड़ती है।” एक अफ़्रीकी कहावत का ज़िक्र करते हुए वह कहती हैं, “जब हाथी लड़ते हैं, तो घास ही कुचली जाती है।”
यही स्थिति हमारी धरती की भी है कि जब शक्तिशाली राष्ट्र, संगठन या व्यक्ति, युद्धों या टकरावों में उलझते हैं, तो कमज़ोर और बेगुनाह लोगों को ही इसका हर्जाना उठाना पड़ता है। दुनिया भर में इस समय सूडान, ग़ाज़ा, हेती, यमन, साहेल, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य या इस जैसी कई अन्य जगहों के निर्दोष आम लोग यही “घास” हैं जो हाथियों की लड़ाई में कुचले जा रहे हैं।
