एक अध्ययन के अनुसार, असंतुलित नींद के शिकार किशोरों में खुद को नुकसान पहुँचाने की संभावना काफी अधिक होती है। अध्ययन बताता है कि कम सोना, देर तक जागना या रात में बार-बार जागना किशोरों में आत्म-क्षति के जोखिम से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।

ब्रिटेन में किए गए इस अध्ययन को जर्नल ऑफ चाइल्ड साइकोलॉजी एंड साइकियाट्री में प्रकाशित किया गया है। इस संबंध में विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में किशोरों में आत्म-क्षति की दर तेज़ी से बढ़ रही है जबकि अनुमान के अनुसार, 70 प्रतिशत तक किशोर अपर्याप्त नींद का शिकार हैं।
इस अध्ययन में 2000 और 2002 के बीच ब्रिटेन में जन्मे दस हज़ार से ज़्यादा बच्चों के आँकड़े शामिल गए। प्रतिभागियों से उनकी नींद की आदतों के बारे में कुछ सवाल किये गए। जिसमे उनसे पूछा गया कि वे स्कूल के दिनों में कितनी देर सोते थे, सोने में कितना समय लगता था, और रात में वे कितनी बार जागते थे। उनसे यह भी पूछा गया कि क्या उन्होंने 14 वर्ष की आयु में आत्म-क्षति पहुँचाई थी, यह प्रश्न उनसे तीन साल बाद 17 वर्ष की आयु में सर्वेक्षण के दौरान फिर से पूछा गया।
वारविक विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की पीएचडी उम्मीदवार और प्रथम लेखिका, माइकेला पावले ने बताया कि इस तरह के बड़े पैमाने के डेटा का उपयोग वास्तव में आपको जनसंख्या स्तर पर जानकारी देता है। इस विश्लेषण में उन्होंने पाया कि स्कूल के दिनों में कम नींद, सोने में अधिक समय और 14 साल की उम्र में रात में बार-बार जागना, आत्म-क्षति से एक साथ जुड़ा हुआ है और 3 साल बाद 17 साल की उम्र में भी।
शोधकर्ताओं ने पाया कि 14 साल की उम्र में नींद की समस्याएं सीधे तौर पर 14 साल की उम्र में और फिर 17 साल की उम्र में आत्म-क्षति व्यवहार से जुड़ी थीं, जिससे पता चलता है कि किशोरावस्था की नींद का आत्म-क्षति पर दीर्घकालिक प्रभाव हो सकता है, और यह जोखिम में रहने वाले किशोरों की सहायता करने का एक माध्यम हो सकता है।
वरविक विश्वविद्यालय में वारविक स्लीप एंड पेन लैब की निदेशक और वरिष्ठ लेखिका प्रोफेसर निकोल टैंग ने कहा: “आत्म-क्षति किशोरों और युवा वयस्कों में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। यह एक गंभीर विषय है। यह जानते हुए कि खराब और खंडित नींद अक्सर आत्मघाती विचारों और व्यवहार से पहले या साथ-साथ होने का एक संकेत है, यह हमें जोखिम निगरानी और प्रारंभिक रोकथाम के लिए एक उपयोगी केंद्र प्रदान करता है।”
बहरहाल, चूँकि किशोरावस्था आत्म-क्षति के प्रति संवेदनशीलता और संभावित रोकथाम का एक महत्वपूर्ण दौर है, इसलिए यह अध्ययन इस बात पर ज़ोर देता है कि किशोरों में नींद के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐसा करने से दीर्घकालिक सुरक्षात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
इस समस्या विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि ऐसे बच्चों को संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी के माध्यम से सहायता प्रदान की जानी चाहिए ताकि समय रहते इस प्रवृत्ति को नियंत्रित किया जा सके और आत्म-क्षति की संभावना को कम किया जा सके।













