मौजूदा समय में भारत में करीब 47 हजार बच्चे लापता हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के पुलिस अधिकारियों को गुमशुदगी के मामलों में तुरंत प्राथमिकी दर्ज का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने मानव तस्करी विरोधी इकाइयों को चार सप्ताह के भीतर पूरी तरह सक्रिय किए जाने का भी आदेश दिया है।
हर साल 25 मई को दुनियाभर में ‘अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस’ (International Missing Children’s Day) मनाया जाता है। आज के तकनीक युक्त दौर में इंटरनेट, शहरीकरण और बढ़ती सामाजिक चुनौतियों के बीच बच्चों के गुम होने की घटनाएं चिंता का विषय है।
एक बच्चे का लापता हो जाना महज़ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस हमें यह याद दिलाता है कि धरती का हर बच्चा सुरक्षित बचपन का अधिकारी है।
आज जब दुनियाभर में हर साल हजारों बच्चे लापता हो जाते हैं तो यही कारण है कि सरकारें और सामाजिक संगठन इन बच्चों की तलाश के लिए तेज और प्रभावी तंत्र विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
अकसर हम सभी छोटे बच्चों के मेलों, बाजारों, रेलवे स्टेशन या फिर भीड़भाड़ वाले इलाकों में परिवार से बिछड़ने की घटनाएं सुनते हैं। इनमें से कई बच्चे मानव तस्करी, बाल मजदूरी, अपहरण, घरेलू हिंसा और अपराधों का शिकार बनते हैं। वहीँ कुछ बच्चे पारिवारिक विवादों, मानसिक तनाव, ऑनलाइन धोखाधड़ी या गलत संगति के कारण भी घर छोड़ देते हैं।
इस संबंध में विशेषज्ञों का कहना है कि किसी बच्चे के गुम होने के शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। उनके अनुसार अगर समय रहते सूचना देकर कार्रवाई की जाए तो बच्चे को सुरक्षित खोजे जाने की संभावना बढ़ जाती है।
सुप्रीम की बात करें तो इसी सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देश में आज की तारीख में 47 हजार बच्चे गुमशुदा हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने देशभर के पुलिस अधिकारियों को गुमशुदगी के मामलों में तुरंत प्राथमिकी दर्ज का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि मानव तस्करी विरोधी इकाइयों को चार हफ्तों के भीतर पूरी तरह सक्रिय किया जाए।
भारत में भी गुमशुदा बच्चों की समस्या पर नज़र डालें तो यह एक गंभीर मामला है। एनसीआरबी यानी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज किए जाते हैं।
हालांकि कई बच्चों को सुरक्षित वापस लाने में पुलिस, बाल संरक्षण इकाइयों और सामाजिक संगठनों का सहयोग मिला है, लेकिन कुछ मामलों में बच्चों का लंबे समय तक कोई पता नहीं मिल पाता।
अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस का मुख्य उद्देश्य गुमशुदा बच्चों की तलाश, उनकी सुरक्षा और बच्चों से जुड़े अपराधों के प्रति समाज में जागरूकता फैलाना है। यह दिन केवल गुमशुदा बच्चों को याद करने का अवसर मात्र नहीं है, बल्कि यह समाज, प्रशासन और परिवारों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति अधिक जिम्मेदार और सतर्क बनने का संदेश भी देता है।
इतिहास
25 मई 1979 को अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में छह वर्षीय इटन पैट्ज नाम का बच्चा अचानक लापता हो गया था। उसके परिवार और पुलिस ने लंबे समय तक उसकी तलाश की, लेकिन उसका कोई पता नहीं चल पाया। इस घटना ने पूरे अमरीका को प्रभावित किया था और तभी बच्चों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरू हुई।
इसके बाद वर्ष 1983 में अमरीका ने 25 मई को ‘नेशनल मिसिंग चिल्ड्रन्स डे’ के रूप में मनाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह मिशन अन्य देशों तक पहुंचा और बाद में इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। आज दुनिया के कई देशों में यह दिवस बच्चों की सुरक्षा और गुमशुदा बच्चों की खोज के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से मनाया जाता है।