एक अनुमान के मुताबिक़, साल 2030 तक भारत में सृजित होने वाले 70 प्रतिशत नए रोज़गार शहरी क्षेत्रों से उत्पन्न होंगे। विश्व बैंक की नै रिपोर्ट इस संबंध में सचेत करते हुए बताती है कि समय रहते यदि जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से निपटने की तैयारी नहीं की गई, तो भारतीय शहरों को अरबों डॉलर का नुक़सान उठाना पड़ सकता है।

जहाँ एक तरफ रोज़गार का सृजन आर्थिक विकास के प्रमुख केन्द्र का रास्ता खोल रहे हैं वहीं भारत सरकार के आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के सहयोग से तैयार की गई “Towards Resilient and Prosperous Cities in India” का कहना है कि 2050 तक देश की शहरी आबादी लगभग दोगुनी होकर 95 करोड़ से अधिक हो जाने की सम्भावना है।
यह जनसंख्या वृद्धि साल 2070 तक लगभग 14 करोड़ 40 लाख नए घरों की आवश्यकता की बात कहती है। जबकि दूसरी तरफ तेज़ी से बढ़ते और अनियोजित नगरीकरण के चलते शहरों का तापमान, आसपास के क्षेत्रों की तुलना में 3 से 4 डिग्री तक बढ़ गया है।
रिपोर्ट में चेन्नई, इन्दौर, नई दिल्ली, लखनऊ, सूरत और तिरूअनन्तपुरम सहित, 24 भारतीय शहरों का विश्लेषण किया गया है।
इस बारे में विश्व बैंक के भारत निदेशक अगस्ते टानो क्वामे कहते हैं- “अब समय आ गया है कि भारत हरित एवं सहनसक्षम विकास में निवेश करते हुए, बड़े पैमाने पर जलवायु-अनुकूल शहरों का निर्माण करे – चाहे वह आवास हो, परिवहन, या नगर सेवाओं का क्षेत्र. ऐसे प्रयासों से शहर जलवायु संकट के प्रभावों का सामना करते हुए भी सतत विकास और रोज़गार सृजन में सक्षम बनेंगे।”
निष्कर्षों के अनुसार, यदि समय पर अनुकूलन उपाय अपनाए जाएँ, तो 2030 तक, हर वर्ष बाढ़ से होने वाले लगभग 5 अरब डॉलर और 2070 तक 30 अरब डॉलर की सम्भावित हानि को टाला जा सकता है। इतना ही नहीं, साल 2050 तक अत्यधिक गर्मी के प्रभाव से एक लाख 30 हज़ार से अधिक लोगों के जीवन की रक्षा भी सम्भव हो सकती है।














