“कई देशों में पारम्परिक चिकित्सा पद्यति आज भी उपचार का पहला सहारा है।’ इस विचारधारा को नई दिल्ली में पारम्परिक चिकित्सा पर हुई वैश्विक चर्चा ने और भी स्पष्ट कर दिया है।

इस चर्चा के दौरान कुछ ऐसे विचार उभर कर सामने आए कि पारम्परिक चिकित्सा पद्यति को, बड़े पैमाने पर सुरक्षित व भरोसेमन्द बनाने के लिए साक्ष्य, नियम, डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों की भूमिका, अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत सरकार के आयुष मंत्रालय की डॉक्टर तनुजा नेसरी बताती हैं कि आयुर्वेद जैसी प्रणालियाँ बीमारी होने के बाद इलाज तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि स्वास्थ्य बनाए रखने पर ज़ोर देती हैं। इसका सिद्धान्त, दिनचर्या, आहार और व्यवहार को प्रकृति के अनुरूप रखना है।
उनके अनुसार, तकनीक अब घरेलू और परम्परागत ज्ञान को अनुसन्धान और नीति से जोड़ने का अवसर देती है। लेकिन इसका लाभ तभी होगा, जब इसका इस्तेमाल ज़िम्मेदारी और सावधानी के साथ किया जाए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के योरोप क्षेत्र के निदेशक डॉक्टर हैंस हेनरी पी क्लूग इस आम धारणा को चुनौती देते हैं कि पारम्परिक चिकित्सा केवल वैश्विक दक्षिण तक सीमित है।
भारत में पारम्परिक चिकित्सा पर हुए दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन में भाग लेने आए मंगोलिया के डॉक्टर ओडगारिग अल्तसाइख़ान ने इसे दैनिक जीवन की देखभाल का हिस्सा बताते हुए कहा, “यह केवल निदान और उपचार नहीं है। यह सन्तुलन के बारे में है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सन्तुलन।”
आगे उन्होंने बताया कि मंगोलिया की पारम्परिक चिकित्सा दो धाराओं में विकसित हुई है। एक धारा तिब्बती चिकित्सा से प्रभावित है। दूसरी, उससे भी पुरानी शैमैनिक परम्पराओं से जुड़ी है। लेकिन इसका मक़सद केवल बीमारी का इलाज करना भर नहीं है।
डॉक्टर अल्तसाइख़ान बताते हैं कि यह ज्ञान किताबों से नहीं, बल्कि घुमन्तू जीवनशैली से आगे बढ़ा। समुदायों ने जानवरों, ऋतुओं और धरती को देखकर सीख हासिल की। आज चुनौती केवल इसे बचाने की नहीं है, बल्कि इसे इस तरह समझाने की है कि लोग इसे समझ सकें और इसका अर्थ भी बना रहे।
दक्षिण अफ़्रीका में, स्थानीय ज्ञान प्रणालियों की साधक रुटेंडो नगारा पारम्परिक चिकित्सा को सीधे प्रकृति और पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ती हैं। वह कहती हैं कि पारम्परिक चिकित्सा ने “हज़ारों वर्षों तक समाजों को सहारा दिया है,” लेकिन उपनिवेशवाद और संसाधनों के दोहन के साथ इसे हाशिये पर धकेल दिया गया. कुछ जगहों पर तो इसे अपराध तक घोषित कर दिया गया। रुटेंडो नगारा कहती हैं, “जब पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट होते हैं, तो आदिवासी उपचार की नींव भी नष्ट हो जाती है।”
उन्होंने कहा, “योरोप की लगभग 25 प्रतिशत आबादी यानि क़रीब 25 करोड़ लोगों ने, पिछले एक वर्ष में किसी न किसी रूप में पारम्परिक या पूरक चिकित्सा का उपयोग किया है।” उन्होंने बताया, “पारम्परिक चिकित्सा अरबों लोगों के लिए अन्तिम छोर की स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं है। यह वह पहली जगह है, जहाँ वे इलाज के लिए जाते हैं।”














