समय पर इलाज मिलने पर ट्रामा से होने वाली 50 प्रतिशत मृत्यु रोकी जा सकती हैं- डॉ. हैदर अब्बास

समय पर इलाज की सुविधा मुहैया कराकर उन मरीज़ों को जीवनदान दिया जा सकता है, जिन्हे इमरजेंसी की आवश्यकता होती है। शुक्रवार को वर्ल्ड इमरजेंसी मेडिसिन डे के अवसर पर आयोजित वेबिनार में डॉ. हैदर अब्बास ने आपातकाल से जुड़ी सावधानी और उपचार की जानकारी दी।

आज भी बीमारी की गंभीरता से अनजान है 95 फीसदी आबादी

केजीएमयू इमरजेंसी मेडिसिन विभाग अध्यक्ष डॉ. हैदर अब्बास ने इस अवसर पर ऐसे मामलों की और ध्यान दिलाया जहां तीमारदार के रूप में दी जाने वाली प्राथमिक चिकित्सा के ज़रिये न सिर्फ मर्ज़ पर आपात स्थिति में काबू पाया जा सकता है बल्कि काफी हद तक उपचार की दिशा में कारगर काम भी किया जा सकता है।

  • 60 से 70 फीसदी मरीज़ सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते हैं।
  • ट्रॉमा से होने वाली 50 फीसदी मौतों को रोका जा सकता है।
  • 95 फीसदी आबादी बीमारी के लक्षण और गंभीरता से अंजान हैं।
  • 80 फीसदी मरीज देरी से अस्पताल पहुँचते हैं।
  • मध्यम इनकम वाले देश के लोगों में स्ट्रोक से 85 प्रतिशत मृत्यु हो रही है।

इस चर्चा में जो आंकड़े निकल कर सामने आये उससे पता चलता है कि आज भी 60 से 70 फीसदी मरीज़ सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पहुँच पाते हैं। यहाँ तक कि हार्ट अटैक या लकवा सहित दूसरी गंभीर बीमारी में भी लोग घर में रहकर मरीज के ठीक होने का इंतजार करते हैं। इमरजेंसी मेडिसिन विभाग अध्यक्ष डॉ. हैदर अब्बास ने इसे चिंताजनक बताया।

वर्ल्ड इमरजेंसी मेडिसिन डे पर आयोजित वेबिनार में बोलते हुए डॉ. हैदर अब्बास ने कहा कि दिल का दौरा पड़ने पर मरीज को एक घंटे के भीतर इलाज मिल जाना चाहिए। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं को हल्की प्रसव पीड़ा होते ही अस्पताल पहुंचाना चाहिए। इसके बावजूद इन आज भी दोनों ही परिस्थितियों में मरीज देरी से आ रहे हैं। जबकि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा देश भर के सभी मेडिकल कॉलेजों में इमरजेन्सी मेडिसिन विभाग का होना अनिवार्य है।



दिल का दौरा पड़ने पर मरीज को एक घंटे के भीतर इलाज मिल जाना चाहिए जबकि गर्भवती महिला को हल्की प्रसव पीड़ा होते ही अस्पताल पहुंचाना चाहिए। आज भी सांप, कुत्ते आदि काटने या फिर दवा के रिएक्शन की गंभीरता से लापरवाह हैं लोग।



इस अवसर पर कुलपति डॉ. बिपिन पुरी ने कहा कि मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर इलाज मिलना चाहिए। इमरजेन्सी में शीघ्र हस्तक्षेप करके ही इन मृत्युदर को कम किया जा सकता है।

ट्रॉमा से होने वाली 50 फीसदी मौतों को रोका जा सकता है तथा दिल का दौरा पड़ने से होने वाली मौत को भी घटा सकते हैं। ये जानकारी सोसाइटी फॉर इमरजेंसी मेडिसिन ऑफ इंडिया के एक्जक्यूटिव सदस्य डॉ. लोकेंद्र गुप्ता ने दी। डॉ. गुप्ता के मुताबिक़ आज भी 95 फीसदी आबादी बीमारी के लक्षण और गंभीरता से अंजान हैं और यही कारण है कि समय पर इलाज के लिए ये मरीज़ अस्पताल नहीं पहुँच पाते हैं। उन्होंने ये भी बताया कि मध्यम इनकम वाले देश के लोगों में स्ट्रोक से 85 प्रतिशत मृत्यु हो रही है।

डॉ. लोकेंद्र गुप्ता ने ये भी बताया कि वर्तमान में मुफ्त एम्बुलेंस सुविधा होने के बावजूद लोग सांप, कुत्ते आदि काटने की दशा में भी घर रहते हैं। संक्रमण या फिर दवा के रिएक्शन को भी गंभीरता से नहीं लेते है। इन समस्याओं से त्रस्त करीब 80 फीसदी मरीज देरी से अस्पताल पहुँचते हैं।

डॉ. सुजीत सिंह चर्चा के दौरान बताया कि दिल का दौरा पड़ने वाले लोगों में केवल 20 से 30 प्रतिशत मरीज ही समय पर अस्पताल पहुँच पाते हैं। जबकि ऐसे मरीज को तुरंत भर्ती कराने की जरूरत होती है। अधिकतर लोग इन आपात स्थितियों से या तो अनजान होते है या फिर घर पर मरीज़ को रखकर उसके ठीक होने का इंतजार करते हैं।

वर्ल्ड इमरजेंसी मेडिसिन डे के अवसर पर आयोजित वेबिनार में देश भर के 100 से ज्यादा विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

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