जैव विविधता को सहेजकर ही मानव अस्तित्व और सभ्यता को सहेजा जा सकता है

प्रतिवर्ष 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इसका मक़सद जैव विविधता के महत्व को रेखांकित करने के साथ इसके संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता उत्पन्न करना है।

विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का केवल लगभग 2.4 प्रतिशत क्षेत्र होने के बावजूद भारत वैश्विक जैव विविधता का लगभग 7-8 प्रतिशत भाग समेटे हुए है। इस तरह भारत विश्व के मेगा-बायोडायवर्स देशों में शामिल है।

भारत के नक़्शे को प्रमुख जैव विविधता भागों के हवाले से देखें तो पते हैं-
हिमालय क्षेत्र: दुर्लभ वनस्पतियों, हिम तेंदुए और औषधीय पौधों से समृद्ध।
पश्चिमी घाट: विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता क्षेत्रों में से एक।
इंडो-बर्मा क्षेत्र: पूर्वोत्तर भारत का विशाल क्षेत्र, जो पक्षियों और ऑर्किड की विविधता के लिए प्रसिद्ध है।
सुंडालैंड (निकोबार क्षेत्र): समृद्ध समुद्री एवं द्वीपीय जैव विविधता का केंद्र।

वहीँ भारत के प्रमुख वन्यजीवों पर नज़र डालें तो बाघ, एशियाई हाथी, एक सींग वाला गैंडा, सिंह,हिम तेंदुआ हमारी जैव विविधता को समृद्ध बनाती हैं।

इस दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र द्वारा की गई थी। हालाँकि शुरुआत में इसे 29 दिसंबर को मनाया जाता था, मगर बाद में वर्ष 2000 में जैव विविधता अभिसमय (Convention on Biological Diversity) को अपनाए जाने की ऐतिहासिक तिथि 22 मई 1992 के सम्मान में इसकी तिथि में बदलाव कर दिया गया

वर्तमान में जैव विविधता को कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है जिसमे वनों की कटाई सबसे बड़ी समस्या है। वनों की निरंतर कटाई से होने वाला विनाश प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर रहा है।

दूसरी बड़ी समस्या शहरीकरण और औद्योगीकरण है। इसकी वजह से विकास की बढ़ती परियोजनाएं प्राकृतिक क्षेत्रों को सीमित कर रही हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली तापमान वृद्धि और बदलते मौसम चक्र अनेक प्रजातियों के अस्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं।

वायु, जल और भूमि प्रदूषण से भी जैविक जीवन को गंभीर क्षति पहुंचा रहे हैं। अवैध शिकार और वन्यजीव तस्करी: दुर्लभ जीवों के अस्तित्व पर गंभीर संकट उत्पन्न हो रहा है। आक्रामक विदेशी प्रजातियां: बाहरी प्रजातियां स्थानीय प्रजातियों को प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेल रही हैं।

हालाँकि संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर कई पहलें की जा रही हैं। इसमें जैव विविधता का संरक्षण, जैव संसाधनों का सतत उपयोग, लाभों का न्यायपूर्ण वितरण, सतत विकास लक्ष्य (SDGs) के अलावा वर्ष 2030 तक पृथ्वी की 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों को संरक्षित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

मगर यह भी याद रखना होगा कि जैव विविधता संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार के साथ यह प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व भी है। इसके लिए पर्यावरणीय जागरूकता फैलाने के साथ वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने तथा प्लास्टिक का उपयोग कम करके अपनी भागीदारी निभाई जा सकती है। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग करके तथा युवाओं और शैक्षणिक संस्थानों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करके भी यह सहयोग संभव है।

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