दुर्लभ सूर्य ग्रहण ‘रिंग ऑफ़ फायर’ कैसे बनता है?

एक दुर्लभ सूर्य ग्रहण, जिसे आम तौर पर ‘रिंग ऑफ़ फायर’ के नाम से जाना जाता है, 17 फरवरी को होगा। यह खगोलीय घटना सीमित इलाकों में दिखाई देगी, जबकि पूरा ‘रिंग ऑफ़ फायर’ नज़ारा सिर्फ़ अंटार्कटिका में ही देखा जा सकेगा।

दुर्लभ सूर्य ग्रहण ‘रिंग ऑफ़ फायर’ कैसे बनता है?

यह भारतीय समयानुसार दोपहर 12:31 बजे शुरू होगा। यह दुर्लभ खगोलीय घटना दक्षिणी गोलार्ध में दिखाई देगी, जबकि भारत में सूर्य क्षितिज के नीचे होने के कारण इसके दर्शन संभव नहीं होंगे।

अमरीकी स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार, इस ग्रहण के दौरान चांद सूरज का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा ढक लेगा। खगोलविदों के अनुसार, ‘रिंग ऑफ़ फायर’ नज़ारा लगभग 2 मिनट 20 सेकंड तक रहेगा, जबकि ग्रहण का कुल समय लगभग 271 मिनट होगा।

यह सूर्य ग्रहण तब होता है जब चांद, पृथ्वी और सूरज के बीच आ जाता है, लेकिन अपनी रिलेटिव दूरी के कारण यह सूरज को पूरी तरह से ढक नहीं पाता है। सूरज का बाहरी हिस्सा एक चमकीले गोले के रूप में दिखाई देता है, जो रिंग ऑफ़ फायर जैसा नज़ारा दिखाता है।

हालांकि पूरा सूर्य ग्रहण सिर्फ़ अंटार्कटिका में दिखेगा, लेकिन आंशिक सूर्य ग्रहण अफ्रीका, दक्षिण अमरीका, प्रशांत महासागर, हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर के कुछ हिस्सों में भी दिखेगा।

इस अवसर पर विशेषज्ञों द्वारा चेतावनी दी जाती है कि सूर्य ग्रहण को सीधे देखना खतरनाक हो सकता है और इससे आंखों की रोशनी खराब हो सकती है। ग्रहण देखने के लिए खास ग्रहण वाले चश्मे या सही सोलर फिल्टर वाले टेलिस्कोप का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। आम धूप के चश्मे इस काम के लिए असरदार नहीं होते।

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