अफ़्रीका, एशिया और कैरीबियाई देशों में रंग निखारने का दावा करने वाले उत्पादों में पारे (mercury) का व्यापक इस्तेमाल किया जाता रहा है। हाल ही में एक अहम सन्धि के तहत, प्रसाधन उत्पादों में पारे के इस्तेमाल पर पाबन्दी लगाई गई है, जिसे अनेक अफ़्रीकी देशों ने भी अपनाया है। इस पृष्ठभूमि में, स्वास्थ्य विशेषज्ञों व पीड़ितों ने सभी देशों से इन नियमों को ज़मीनी स्तर पर सख़्ती से लागू किए जाने की अपील की है।

जानकारों का कहना है कि इस मांग को बढ़ावा देने की मुख्य वजह है, उपनिवेशकालीन मानसिकता, जिसमें गोरी त्वचा को सौन्दर्य का मानक माना जाता है। ब्यूटी प्रोडक्ट में पारा इसलिए मिलाया जाता है क्योंकि यह मैलानिन बनने की प्रक्रिया को रोकता है, जो त्वचा के रंग को हल्का करता है।
गौरतलब है कि त्वचा को गोरा करने का दावा करने वाले उत्पादों का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है। Fortune Business Insights के अनुसार 2023 में इसका आकार 9 अरब डॉलर था, जो 2032 तक 16 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
एशिया सहित अफ़्रीका और कैरीबियाई क्षेत्र में ऐसे साबुन और क्रीम बेहद लोकप्रिय हैं मगर कई उत्पादों में स्टेरॉयड, हाइड्रोक्यूनॉन और पारा जैसे हानिकारक रसायन पाए जाते हैं।
मिनामाता कन्वेंशन की कार्यकारी सचिव मोनिका स्तान्केविच कहती हैं, “कॉस्मेटिक्स में पारा मिलाना एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है, जिसे अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है। लेकिन अब इन उत्पादों को ख़त्म करने की इच्छा बढ़ रही है, जो दुनिया भर में अनगिनत लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण की रक्षा के लिए अहम है।”
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, इन उत्पादों के इस्तेमाल से त्वचा का रंग बिगड़ सकता है, दाग-धब्बे और निशान पड़ सकते हैं तथा संक्रमण से लड़ने की क्षमता घट सकती है। अधिक मात्रा में पारा लिवर और किडनी को नुक़सान, मानसिक व तंत्रिका सम्बन्धी समस्याएँ, अवसाद और बच्चों में विकास में देरी का कारण बन सकता है।
पारे के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए 150 से अधिक सदस्य देश मिनामाता कन्वेंशन की पुष्टि कर चुके हैं। इस सन्धि का नाम जापान की मिनामाता खाड़ी पर रखा गया, जहाँ 1950 और 1960 के दशकों में पारे के प्रदूषण से सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुई और लाखों लोग बीमार पड़े।
अप्रैल में, इस कन्वेंशन के तहत सौंदर्य प्रसाधनों में पारे के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 13 अफ़्रीकी देशों ने इस क़दम का समर्थन करके संयुक्त कार्रवाई का वादा किया, लेकिन क्रियान्वयन अभी धीमा है।
कुछ देशों ने इसे अपने राष्ट्रीय क़ानून में शामिल नहीं किया है और जहाँ क़ानून मौजूद हैं वहाँ भी गुप्त उत्पादन व इंटरनैट के माध्यम से बिक्री के कारण नियम लागू कर पाना कठिन है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के नेतृत्व में एक प्रारम्भिक परियोजना के तहत गेबॉन, जमाइका और श्रीलंका की मदद की जा रही है, जहाँ सरकारों को पारा युक्त सौन्दर्य प्रसाधनों को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने के लिए क़ानून बनाने में सलाह मुहैया कराई जा रही हैं।
विषैले त्वचा गोरा उत्पादों की पहचान के लिए सीमा शुल्क एजेंसियों को समर्थन दिया जा रहा है और लोगों को अपनी प्राकृतिक त्वचा का रंग अपनाने के लिए जन-जागरूकता अभियान भी जारी है।













