गरीब और विकासशील देशों के लिए चरम मौसमीय घटनाएं लंबे समय से खतरा बनी हुई हैं। इसके बावजूद इन घटनाओं को वह प्रमुखता नहीं मिल पाती जो मिलनी चाहिए।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट-2026 भविष्य में आने वाले खतरे से निपटने के लिए प्राथमिकताएं तय करती है। इसमें तीन प्रकार की परिस्थितियों का आंकलन किया गया है। इनमें पहला है तुरंत (2026), दूसरा थोड़े समय के लिए (2028) जबकि तीसरा है दीर्घकालीन समय के लिए यानी (2036) तक।
संयुक्त राष्ट के परिणामों के हवाले से जानकारों का कहना है रिपोर्ट बताती है कि शॉर्ट टर्म में एनवायरनमेंटल रिस्क को कम प्राथमिकता ऐसे समय में दी जा रही है जब वैज्ञानिक चेतावनी अधिक गंभीर होती जा रही हैं।
गौरतलब है कि पिछले चार सालों में चरम मौसमीय घटनाएं क्रमश: पहले और दूसरे नंबर पर जोखिम के रूप में थीं जिन्हें अब आने वाले दो सालों में नंबर चौथे पर रखा गया है। प्रदूषण को भी छठे से बढ़ाकर नौवें स्थान पर कर दिया गया है। वहीँ प्रदूषण को इस सूची में नीचे जगह दी गई है।
रिपोर्ट से पता चलता है कि इस बदलाव के माध्यम से दिखाता गया है कि किस तरह जियोपॉलिटिकल तनाव और आर्थिक अस्थिरता पर्यावरणीय चिंताओं पर हावी हो रहे हैं। इसमें यह भी बताया गया है कि अगले दो वर्षों में गैर पर्यावरणीय जोखिम, नीतियों पर हावी होने की उम्मीद जताई गई है।
रिपोर्ट बताती है कि टॉप टेन लॉन्ग-टर्म रिस्क में से पांच पर्यावरण से संबंधित हैं। ये विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के एग्जिस्टेंशियल (अस्तित्ववाद) की प्रकृति को बताते हैं, और विकासशील देशों में इनका अनुभव सबसे अधिक किया जाएगा।
चरम मौसमीय घटनाएं 2036 तक टॉप ग्लोबल रिस्क के रूप में बने रहेंगे, इसके ठीक बाद जैव विविधता का नुकसान और इकोसिस्टम का गिरना व अर्थ सिस्टम में आवश्यक बदलाव देखने में आएंगे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु कार्रवाई में हुई नकामी को 2024 के बाद से वैश्विक जोखिम के तौर पर नहीं देखा गया है। भले ही अमेरिका के राष्ट्रपति ने तमाम वैश्विक पर्यावर्णीय संस्थाओं से अपने देश को अलग कर लिया हो।
यून एमिशन गैप रिपोर्ट 2025 की माने तो दस वर्षों में वैश्विक तापमान प्री इंडस्ट्रियल स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर सकता है। ऐसे में बहुत अधिक गर्मी, सूखा, बाढ़ और जंगल में लगने वाली आग की संख्या बढ़ने के संकेत मिले हैं। इसके बावजूद दुनिया तेजी से बढ़ती वेश्विक राजनीतिक तनाव, व्यापारिक रुकावटें और संसाधनों पर प्रतिद्वंदिता ने राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों को सरकारों एजेंडे में प्राथमिकता दे रही है।
गौरतलब है कि पर्यावरणीय जोखिम से गरीब और मध्यम आय वाले देशों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है, भले ही उनका ग्लोबल एनवायरनमेंटल नुकसान में सबसे कम योगदान रहे।











