देश की बढ़ती जनसँख्या अपने चरम पर पहुंचकर अब घटने का रुख अपने है। दूसरे शब्दों में कहने तो अब देश में बच्चों की पैदाइश घट रही है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रजनन दर 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे आ चुकी है।
वर्तमान में भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में आता है। जबकि मौजूदा हालात को देखते हुए एक्सपर्ट कह रहे हैं कि ये डेमोग्राफिक स्थिति हमेशा नहीं रहेगी। जानकारों का यह भी कहना है कि रोजगार, कौशल विकास और उत्पादन को सही अनुपात में न बढ़ाए जाने की देश में परिस्थितियां गंभीर हो सकती हैं। उनके मुताबिक़, भविष्य में देश को बुजुर्ग आबादी का बोझ उठाना पड़ सकता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में घटती प्रजनन दर की वजह से आने वाले समय को लेकर जानकारों के कयास भी चौकाने वाले हैं। इस हवाले से एक्सपर्ट इस बात के संकेत दे रहे हैं कि भविष्य में देश की स्थिति चीन जैसी हो सकती है। ऐसा होने पर जो परिस्थितियां सामने आएंगी उसमें बढ़ी हुई बुजुर्ग आबादी के साथ कार्यबल के घटने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबित, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 रह गई है, जो स्थिर आबादी बनाए रखने के आवश्यक रिप्लेसमेंट स्तर 2.1 से कम है। देश में पिछले कुछ वर्षों में जन्मदर में लगातार गिराने की स्थिति बनी हुई है। इस संबंध में जानकारों का मानना है कि, ऐसी स्थिति यदि लंबे समय तक बनी रही, तो भविष्य में भारत में भी चीन की तरह बुजुर्ग होती आबादी और घटते कार्यबल के साथ आर्थिक दबाव जैसी चुनौतियां सामने होंगी।
जन्मदर का घटना चिंता का विषय है
एक्सपर्ट्स के अनुसार, शिक्षा के बढ़ते स्तर के साथ शहरीकरण, देर से होने वाली शादी, महिलाओं का बढ़ता काम के प्रति रुझान और परिवार नियोजन के साधनों तक बेहतर पहुंच के साथ बच्चों की महंगी परवरिश के नतीजे में जन्मदर में गिरावट हुई है।
हाल ही में मिलने वाले आंकड़ों बताते हैं कि देश की कुल प्रजनन दर 1.9 तक पहुंच गई है। जबकि किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए उसकी प्रजननदर करीब 2.1 होना चाहिए। घटे हुए आंकड़े का सीधा अर्थ यह है कि नई पीढ़ी भविष्य में इस वर्तमान आबादी को पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर पाएगी।
ऐसे में जानकार चेतावनी देते हुए कहते हैं कि देश आने वाले कुछ सालों में उसी जनसांख्यिकीय बदलाव की ओर बढ़ सकता है, जिसका सामना चीन कर रहा है। लगातार कम होती जन्मदर के नतीजे में चीन में इस समय बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ी है। साथ ही कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या में भी बड़ी कमी सामने आई है। इन बदलाव ने चीन के सामाजिक ढांचे सहित अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित किया है।