जर्नल ऑफ अल्जाइमर्स डिजीज में प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि नींद की दवा के लगातार उपयोग से मनोभ्रंश का खतरा बढ़ जाता है। हाल ही में नए अध्ययन सामने आए हैं जो दोनों के बीच के संबंधों की गहरी जानकारी प्रदान करते हैं।
एक अध्ययन के मुताबिक़, सामान्य नींद की दवाएं डिमेंशिया से जुड़ी हो सकती हैं। इस शोध की हैरान करने वाली बात यह है कि इसका प्रभाव नस्ल से जुड़ा हुआ है। उदहारण के तौर पर एक ही अध्ययन में श्वेत लोगों पर होने वाला असर अश्वेत लोगों से भिन्न था।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा पिछले दिनों किये एक अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जो लोग अकसर नींद की गोलियों का सेवन करते हैं उनमें मनोभ्रंश विकसित होने का खतरा बाक़ी लोगों से अधिक हो सकता है।
हालाँकि डिमेंशिया के सटीक कारण अभी भी अज्ञात हैं। विशेषज्ञ पारिवारिक इतिहास, उम्र, सिर में चोट, जीवनशैली और खराब हृदय स्वास्थ्य को जोखिम कारकों के रूप में बताते हैं।
एक्सपर्ट यह भी स्वीकार करते हैं कि नींद और डिमेंशिया के बीच एक संबंध मौजूद है।जानकार बताते हैं कि बेंजोडायजेपाइन जैसी कुछ नींद की दवाएँ मनोभ्रंश के बढ़ते जोखिम से जुड़ी हैं।
इस विषय पर हारवर्ड का शोध बताता है कि रात भर में एक व्यक्ति चार से छह नींद चक्रों से गुज़र सकता है जो समयांतराल में भिन्न होते हैं। चरण 3 और 4 के दौरान व्यक्ति का शरीर खुद को पुनर्स्थापित करता है, जिससे ये चरण संज्ञानात्मक कार्य और समग्र स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हो जाते हैं।
डिमेंशिया से पीड़ित लोग नींद के बाद के चरणों में कम समय और शुरुआती चरणों में अधिक समय बिताते हैं, जो डिमेंशिया बढ़ने के साथ और भी खराब हो सकता है।
अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, इस्तेमाल की जाने वाली नींद की दवा का प्रकार और मात्रा बढ़ते जोखिम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अध्ययन करने वाली टीम ने यह भी सुझाव दिया है कि जोखिम कारक और रोग विकसित होने का जोखिम अलग-अलग नस्ल के लोगों में भिन्न होता है।
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने लगभग 3,000 वयस्कों के डेटा का विश्लेषण किया, जिन्हें अध्ययन की शुरुआत में डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश नहीं था।
अध्ययन में शामिल श्वेत प्रतिभागी, जो अकसर नींद की दवाओं का इस्तेमाल करते थे, उनमें उन लोगों की तुलना में डिमेंशिया विकसित होने की संभावना 79 प्रतिशत अधिक थी, जो शायद ही कभी दवा का इस्तेमाल करते थे।
इसके विपरीत, शोध में पाया गया कि काले प्रतिभागियों के बीच नींद की दवाओं के लगातार उपयोग से उनमें मनोभ्रंश का खतरा नहीं बढ़ा।