सिलक्यारा सुरंग हादसे को पर्यावरणविद सभी के लिए सबक सीखने का एक मौक़ा बताते हैं

उत्तरकाशी के सिलक्यारा में होने वाला बड़ा हादसा बीते कई हादसों की एक श्रंखला है और ये एक बार फिर से चेतावनी है कि प्रकृति के भी कुछ नियम है जिन्हे तोड़ने की दशा में जान और माल का खतरा होता है।

सिलक्यारा सुरंग हादसे को पर्यावरणविद सभी के लिए सबक सीखने का एक मौक़ा बताते हैं

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, इस वर्ष अब तक उत्तराखंड में 1000 से ज़्यादा भूस्खलन हुए हैं, जिनमें 48 लोगों की मौत हुई है। हालाँकि इन मामलों में ज़्यादातर का ज़िम्मेदार मॉनसून की भारी बारिश को माना गया है।

उत्तराखंड ने इस वर्ष अपनी ज़मीन को दरकते देखा है। जोशीमठ क़स्बे में सड़कों और मकानों में पड़ने वाली दरारें अभी ज़्यादा दिनों पुरानी बात नहीं है।

एक दशक पूर्व वर्ष 2013 में केदारनाथ में होने वाली भारी बारिश के कारण बाढ़ में हज़ारों लोगों की जान चली गई थी।

हालांकि पर्यावरण जानकार लगातार इन मामलों के हवाले से चेतावनी देते आये हैं मगर इसके बावजूद भी स्थितियां जस की तस बनी हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी विशेषज्ञों की कमेटी के सदस्य पर्यावरणविद हेमंत ध्यानी ने इस निर्माण पर सुझाव दिया था कि एक छोटी सुरंग बनाई जाए, लेकिन उनके सुझाव को नज़रअंदाज़ किया गया। परिणामस्वरूप ब्लास्टिंग किए जाने से सुरंग ढहने का खतरा बढ़ा।

भारत सरकार की ओर से बतौर सलाहकार बुलाये गए भूमिगत निर्माण और टनल बनाने के ऑस्ट्रेलियाई विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स ने इस हादसे को अपने जीवन का ‘सबसे कठिन’ बचाव कार्य अभियान बताया।

अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भूविज्ञानी सी पी राजेंद्रन का कहना है कि हिमालयी इलाके में बेहद नाजुक चट्टानें हैं और यहाँ स्थिरता का मुद्दा हमेशा से चिंता का विषय रहा है। आगे वह कहते हैं कि यह कोई नई घटना नहीं है क्योंकि सड़क निर्माण या इलाके में सुरंग बनाने के दौरान ऐसी आपदा एक के बाद एक देखने को मिलती हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि हिमालय के पहाड़ काफ़ी नए हैं और यहां की बदलती संरचना के कारण पैदा होने वाली अस्थिरता हमेशा चिंता का विषय रही है।

दरअसल हर भौगोलिक क्षेत्र की अलग प्रतिक्रिया होती है इसलिए पर्यावरणविद सुरंगें बनाने से पहले हर इलाक़े की विशेषताओं को ध्यान में रखने की बात कहते हैं। समस्या पर रोशनी डालते हुए हेमंत ध्यानी एक और तथ्य की तरफ इशारा करते हैं। उनका कहना है कि इस बड़े प्रोजेक्ट को 100-100 किलोमीटर के छोटे हिस्सों में बांट दिए जाने के कारण भी पर्यावरण से जुड़े ख़तरों का आकलन नहीं किया गया है। आगे वह कहते हैं कि सुरंग बनाने के लिए चट्टानों की मज़बूती आदि की गहन पड़ताल करना ज़रूरी होता है।

निर्माण के दौरान इन क्षेत्रों में नियमों की अनदेखी हादसों को और भी बढ़ा देते हैं। जिस समय यह सुरंग ढही, तब तक एग्जिट का रास्ता न बनाया जाना भी एक बड़ी लापवाही दर्शाता है। गौरतलब है कि इसके लिए साल 2018 में इजाज़त दी गई थी।

हिमालय दुनिया की सबसे नई पर्वतमाला है। ऐसे में यहाँ भूगर्भीय हलचल यानी भूकंप की संभावना और भी बढ़ जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक़ उत्तरी हिमालय के जिस क्षेत्र में उत्तराखंड बसा है, उस इलाक़े की चट्टानें सेडिमेंटरी यानी अवसादी हैं।

भूविज्ञानी सी.पी. राजेंद्रन के मुताबिक़ इस क्षेत्र में अलग-अलग मज़बूती वाली अलग-अलग चट्टानें मिलती हैं और ये निर्माण कार्यों के लिए चिंताजनक बात है। वह आगे कहते हैं कि कच्ची चट्टानें भुरभुरी होने के कारण यह इलाक़ा काफ़ी अस्थिर बन जाता है।

पर्यावरणविद हेमंत ध्यानी कहते हैं कि बीते 15-20 वर्षों में सुरंगें बनाने के काम में तेज़ी आई है। ये पहाड़ इतने बड़े स्तर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण को नहीं सह सकते हैं।

वहीँ उत्तरकाशी के सिलक्यारा की यह सुरंग 12,000 करोड़ रुपये की लागत से बनाये जा रहे 890 किलोमीटर लंबे चार धाम प्रॉजेक्ट का हिस्सा है।

गौरतलब है कि इस प्रोजेक्ट में दो मुख्य सुरंगे हैं। इसमें पहली सिलक्यारा में जबकि दूसरी चंबा में है जो कि 400 मीटर लंबी है। साथ ही रेलवे और हाइड्रो पावर के लिए भी कई सुरंगों का निर्माण जारी है। तकरीबन 125 किलोमीटर लंबी रेललाइन के लिए एक दर्जन से ज़्यादा सुरंगे बनी हैं। वर्तमान में यहां 33 सरकारी हाइड्रो प्रॉजेक्ट चल रहे हैं जिनमे 14 अभी निर्माणाधीन हैं।

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