गरीबी मुक्त पर केरल पर राज्य और केंद्र सरकार के अलावा आदिवासियों में मतभेद

केरल इस समय देश का पहला ऐसा राज्‍य है जो पहली नवंबर को इसके आध‍िकार‍िक रूप से गरीबी मुक्त होने की घोषणा करेगा। हालांक‍ि जहाँ एक ओर माकपा सरकार इस उपलब्‍ध‍ि का श्रेय ले रही है वहीँ भाजपा ने इस पर आपत्ति जताई है।

गरीबी मुक्त पर केरल पर राज्य और केंद्र सरकार के अलावा आदिवासियों में मतभेद

केरल के मुख्‍यमंत्री पहली नवंबर को आध‍िकार‍िक रूप से इसकी घोषणा करने जा रहे हैं कि राज्य में एक भी व्‍यक्‍त‍ि गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन नहीं करेगा। यह उपलब्धि केरल को भारत का ऐसा पहला राज्य बनाएगी जो अत्यधिक गरीबी से मुक्त हो गया है।

राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पहली नवंबर को एक भव्य आयोजन में इसकी घोषणा करेंगे कि यहां सभी लोग अत्यंत गरीबी रेखा से ऊपर जी रहे हैं। इस खबर के आम होने के बाद से माकपा और भाजपा आमने-सामने आ गए हैं।

केरल की कम्यूनिस्ट सरकार का कहना है कि राज्य सरकार की योजनाओं और जमीन पर उन्हें सफलता से लागू करने के नतीजे में यह उपलब्धि हासिल हुई है। दूसरी तरफ भाजपा इस उपलब्धि को केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं के प्रतिफल का बड़ा योगदान बता रही है। इस घमासान में एक तीसरा समूह आदिवासियों का भी है जो इस राज्य को गरीबी मुक्त घोषित करने के दावे को ही खारिज कर रहा है।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर का आरोप है कि अब माकपा इसका श्रेय ले रही है। इसे वह गरीबों का मज़ाक उड़ाने और उनके अपमान से जोड़ रहे हैं। साथ ही वह इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की कड़ी मेहनत के नतीजे में राज्य की लगभग 20 करोड़ की की आबादी को गरीबी रेखा से बाहर लाने का श्रेय दे रहे है।

राज्य के तीसरे यानी आदिवासी समूह द्वारा इस राज्य को गरीबी मुक्त घोषित करने के दावे को ही खारिज करने के अपने तर्क हैं। ऐसे में समझना होगा कि अत्यधिक गरीबी आखिर होती क्या है? वास्तव में केरल इससे मुक्त हुआ है?

क्या है अत्यधिक गरीबी रेखा
दरअसल गरीबी रेखा एक न्यूनतम आय या उपभोग का स्तर है, जो यह निर्धारित करती है कि कोई व्यक्ति अपनी बुनियादी ज़रूरतें जैसे भोजन, आश्रय आदि को पूरा करने में सक्षम है या नहीं। इस रेखा से नीचे आने वाली आबादी को गरीबी रेखा से नीचे या बीपीएल माना जाता है और ये वर्ग सरकारी सहायता के पात्र होते हैं।

जो लोग भोजन, पानी, कपड़े और आश्रय जैसी बुनियादी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाते हैं, वे अत्यधिक गरीब की श्रेणी में आते हैं। नीति आयोग के आंकड़े (2021) बताते हैं कि पूरे भारत में गरीबी रेखा के नीचे 14.96 प्रतिशत लोग हैं। गुजरात में 11.66 प्रतिशत, बिहार में 33.76 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 22.93 प्रतिशत लोग गरीब हैं।

गरीबी रेखा के इस पैमाने में आर्थिक आय-व्यय नहीं, बल्कि जीवन-स्तर, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी चीजें शामिल होती हैं। प्रकार से इसे बहुआयी गरीबी (Multidimensional Poverty Index) के रूप में परिभाषित किया गया है।

यदि भारत में गरीबी रेखा का राष्‍ट्रीय औसत देखें तो पाते हैं कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गरीबी रेखा का राष्ट्रीय औसत 1,059.42 रुपये प्रति महीना है और शहरी क्षेत्रों के लिए 1,286 रुपये प्रति माह है। यह खर्च प्रति व्यक्ति पर आधारित है और इसमें भोजन, कपड़े, आवास और अन्य बुनियादी जरूरतों की लागत शामिल है। यानि अगर कोई व्यक्ति इतना खर्च हर महीने नहीं कर पा रहा है तो वह गरीबी रेखा से नीचे है।

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