देशों की क़ानूनी ज़िम्मेदारी है कार्बन उत्सर्जन को रोकना -विश्व न्यायालय

द हेग स्थित अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय का कहना है कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत, जलवायु संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए देश बाध्य हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि देश, इन दायित्वों का उल्लंघन करते हैं, तो उन पर क़ानूनी ज़िम्मेदारी तय होती है।

देशों की क़ानूनी ज़िम्मेदारी है कार्बन उत्सर्जन को रोकना -विश्व न्यायालय

जलवायु के बारे में देशों की ज़िम्मेदारियों पर न्यायालय ने अपनी परामर्शकारी राय जारी की है। जलवायु परिवर्तन की अहमियत को देखते हुए, न्यायालय की इस राय के वैश्विक स्तर पर काफ़ी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की इस मुख्य न्यायिक संस्था ने निर्णय दिया है कि देशों पर यह ज़िम्मेदारी है कि वे ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन से, पर्यावरण की रक्षा करें। साथ ही इस दायित्व को निभाने के लिए सतर्कता और आपसी सहयोग के साथ काम करें।

इसमें पेरिस समझौते के तहत यह बाध्यता भी शामिल है कि देशों को वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में, 1.5 डिग्री सैल्सियस तक सीमित रखना होगा। यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने एक वीडियो सन्देश में, इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा- “यह हमारे पृथ्वी ग्रह के लिए, जलवायु न्याय और निर्णायक कार्रवाई करने की, युवजन की शक्ति के लिए एक विजय है।”

पर्यावरण की रक्षा हेतु उठाए गए इस ज़रूरी क़दम पर न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि देश इन दायित्वों का उल्लंघन करते हैं, तो उन पर क़ानूनी ज़िम्मेदारी तय होती है। ऐसे में उन्हें न केवल अपना ग़लत आचरण रोकना होगा बल्कि फिर से ऐसा नहीं करने का आश्वासन देना होगा और हालात के अनुसार पूर्ण मुआवज़ा भी देना पड़ सकता है।

न्यायालय ने, इस निर्णय को समर्थन के लिए, सदस्य देशों की पर्यावरणीय और मानवाधिकार सन्धियों के प्रति प्रतिबद्धताओं का हवाला दिया। इन देशों ने ओज़ोन परत, जैव विविधता, क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता जैसी कई अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरणीय सन्धियों पर हस्ताक्षर किए हैं, जो उन्हें वैश्विक नागरिकों और भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्यावरण की रक्षा करने के लिए बाध्य बनाती हैं।

कई मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण आवश्यक है। क्योंकि, सदस्य देश संयुक्त राष्ट्र के सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र समेत कई मानवाधिकार सन्धियों के पक्षकार हैं। इसलिए उन्हें जलवायु परिवर्तन से निपटते हुए इन अधिकारों के संरक्षण की गारंटी देनी होती है।

अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय
नैदरलैंड्स के द हेग स्थित यह न्यायालय, संयुक्त राष्ट्र के छह मुख्य अंगों में से एक है। इसमें महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC), ट्रस्टीशिप काउंसिल, और सचिवालय शामिल हैं, और यह एकमात्र ऐसा अंग है जो न्यूयॉर्क में स्थित नहीं है।

गौरतलब है कि प्रशान्त द्वीपीय राष्ट्र वनुआतु ने जलवायु परिवर्तन पर सलाहकार राय लेने के लिए, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख़ करने की घोषणा की थी। यह पहल युवा समूह “जलवायु परिवर्तन का मुक़ाबला करने के लिए प्रशान्त द्वीप छात्र संगठन ” से प्रेरित है, जिसने ख़ासतौर पर, छोटे द्वीप राष्ट्रों में जलवायु परिवर्तन से निपटने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था।

वनुआतु ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में, इस पहल के समर्थन के लिए अन्य सदस्य देशों से आग्रह किया। इसके बाद 29 मार्च 2023 को एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसमें अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) से दो सवालों पर सलाहकार राय माँगी गई।

(1) अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत देशों की पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं, और

(2) जब देश पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाते हैं, तो उनके लिए क़ानूनी परिणाम क्या होंगे?

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत, महासभा या सुरक्षा परिषद, ICJ से परामर्शात्मक राय माँग सकते हैं। हालाँकि ये राय बाध्यकारी नहीं होतीं, लेकिन इनमें महत्वपूर्ण क़ानूनी और नैतिक वज़न होता है।

साथ ही, ये देशों की क़ानूनी ज़िम्मेदारियों को स्पष्ट करके अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के विकास में मदद करती हैं।

यह ICJ का अब तक का सबसे बड़ा मामला है, जिसमें 91 लिखित बयान प्रस्तुत किए गए और 97 देशों ने मौखिक कार्यवाहियों में हिस्सा लिया।

अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय को “विश्व न्यायालय” भी कहा जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच क़ानूनी विवाद सुलझाता है।

यह न्यायालय, संयुक्त राष्ट्र के अंगों और एजेंसियों द्वारा पूछे गए क़ानूनी प्रश्नों पर परामर्शात्मक राय देता है।

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