मानव विकास की चिंताजनक सुस्त रफ़्तार को क्या एआई से मदद मिल सकती है?

वैश्विक महामारी कोविड-19 के बाद से ही मानव विकास की धीमी गति बरक़रार है जिसे वैश्विक प्रगति के लिए ख़तरा माना जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट इस मुद्दे पर सचेत करती है।

मानव विकास की चिंताजनक सुस्त रफ़्तार को क्या एआई से मदद मिल सकती है?

मंगलवार को प्रकाशित ‘मानव विकास रिपोर्ट’, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम का एक वार्षिक अध्ययन है, जो लगातार चौथे वर्ष, धनी व निर्धन देशों के बीच गहरी होती असमानताओं को दर्शाता है।

इन असमानताओं से हमारी दुनिया कम सुरक्षित, अधिक विभाजित, और अर्थव्यवस्था व पारिस्थितिकी झटकों के प्रति और संवेदनशील हो जाएगी। ऐसा जानकारों का मानना है।

यूएन शोधकर्ताओं ने अनुमान व्यक्त किया था कि वर्ष 2030 तक, वैश्विक आबादी द्वारा मानव विकास के ऊँचे स्तर को हासिल कर लिया जाएगा। मगर हाल के कुछ वर्षों में कोविड सहित अन्य संकटों ने इन उम्मीदों पर पानी फेरा है और दुनिया के सभी क्षेत्रों में प्रगति को धीमा किया है।

रिपोर्ट के हवाले से यह मुद्दा भी सामने आया है कि क्या लाखों-करोड़ों लोगों की भलाई के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग एक शक्तिशाली उपाय साबित हो सकता है।

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, एआई के इस्तेमाल, मौजूदा चुनौतियों के सिलसिले में असमानताएँ व्याप्त हैं। दक्षिण एशिया में मानव विकास में प्रगति, असमान ढंग से हो रही है और शिक्षा, इंटरनैट कनेक्टिविटी और एआई टैक्नॉलॉजी के लिए तैयारी में चुनौतियाँ व्याप्त हैं।

भारत में मज़बूत डिजिटल ढाँचा मौजूद है और प्रतिभाओं को सहेजने के भी प्रयास किए जाते हैं, वहीं बांग्लादेश में सामाजिक कार्यक्रमों के लिए एआई का लक्षित ढंग से इस्तेमाल शुरू किया जा रहा है।

पूर्वी एशिया, विश्व भर में एआई जगत में एक बड़ी शक्ति है. एआई शोध, रोबोटिक्स व डेटा पारिस्थितिकी तंत्र में चीन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का पिछले कई दशकों से मानना था कि मानव विकास संकेतक, सधे हुए ढंग से बेहतरी की ओर अग्रसर होना हैं। यहाँ मानव विकास से तात्पर्य, आम लोगों की आज़ादी, उनकी क्षमताओं, अधिकारों व उनके कल्याण जैसे मानकों को मज़बूत करने से है।

यूएन विकास कार्यक्रम के प्रशासक एखिम स्टाइनर ने कहा कि रफ़्तार में आई यह गिरावट, वैश्विक प्रगति के लिए एक वास्तविक ख़तरा है। उनका मानना है कि यदि 2024 की सुस्त प्रगति, नई सामान्य स्थिति बन जाती है, तो 2030 का पड़ाव, दशकों के लिए हाथ से निकल सकता है।

बढ़ते व्यापार तनाव, बद से बदतर रूप धारण कर रहा क़र्ज़ संकट और ऐसे अन्य दबावों की वजह से देशों की सरकारों की क्षमता पर असर हो रहा है. उनके लिए अपनी आबादी की भलाई के इरादे से स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में निवेश कर पाना कठिन है। ऐसे में विकास की दिशा में ले जाने वाले पारम्परिक मार्ग संकुचित होते जा रहे हैं।

रिपोर्ट में इन निराशाजनक संकेतकों के बावजूद, एआई में निहित सम्भावनाओं के प्रति आशा व्यक्त की गई है। अध्ययन दर्शाता है कि व्यवसाय व आम लोग, निशुल्क और कम-क़ीमत वाले एआई उपायों को तेज़ी से अपना रहे हैं।

यूएन विकास कार्यक्रम के शोधकर्ताओं ने एआई के प्रति लोगों की राय जानने के लिए एक सर्वेक्षण कराया, जिसके अनुसार, 60 प्रतिशत प्रतिभागियों का मानना है कि इस टैक्नॉलॉजी से उनके कामकाज पर सकारात्मक असर होगा। साथ ही, उनके लिए नए अवसर सृजित होंगे। विकास के निम्न- और मध्यम-स्तर से गुज़र रहे लोगों में इसके प्रति आशा अधिक नज़र आई।

सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 70 प्रतिशत लोगों ने कहा कि एआई से उनकी उत्पादकता बढ़ने की उम्मीद है, जबकि दो-तिहाई प्रतिभागी, अगले एक वर्ष के भीतर शिक्षा, स्वास्थ्य और अपने कामकाज में एआई के इस्तेमाल की मंशा रखते हैं।

रिपोर्ट का सन्देश है कि ऐसा नहीं है कि एआई के असर को रोका या बदला नहीं जा सकेगा। यह अपने आप में कोई स्वायत्त शक्ति होने के बजाय उन समाजों, मूल्यों व असमानताओं पर निर्भर है, जो उसे आकार देते हैं।

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